पृष्ठ:ग़बन.pdf/२६०

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रमा ने शान्त भाव से कहा——जालपा, तुम मुझे जितना नीच समझ रही हो मैं उतना नीच नहीं हूँ ! बुरी बात सभी को बुरी लगती है इसका दुख मुझे भी है कि मेरे हाथों इतने आदमियों का खून हो रहा है। लेकिन परिस्थिति ने मुझे भी लाचार कर दिया है। मुझमें अब ठोकरें खाने की शक्ति नहीं है । न मैं पुलिस से रार ले सकता है। दुनिया में सभी थोड़े ही आदर्श पर चलते हैं । मुझे क्यों ऊँचाई पर चढ़ाना चाहती हो, जहाँ पहुँचने की शक्ति मुझमें नहीं है ?

जालपा ने तीक्ष्ण स्वर में कहा——जिस आदमी में हत्या करने की शक्ति हो, उसमें हत्या न करने की शक्ति का न होना अचम्भे की बात है । जिसमें दौड़ने की शक्ति हो, उसमें खड़े रहने की शक्ति न हो, इसे कौन मानेगा ? जब हम कोई काम करने की इच्छा करते हैं, तो शक्ति आप-ही-आप जा जाती है ! तुम यह निश्चय कर लो कि तुम्हें बयान बदलना है, बस और सारी बातें आप-ही-आप आ जायंगी।

रमा सिर झुकाये हुए सुनता रहा ।

जालपा ने और आवेश में आकर कहा——अगर तुम्हें यह पाप की खेती करनी है, तो मुझे आज ही यहाँ से विदा कर दो | मैं मुंह में कालिख लगाकर यहाँ से चली जाऊँगी और फिर तुम्हें दिक करने न पाऊँगी । तुम आनन्द से रहना । मैं अपना पेट मेहनत-मजदूरी करके भर लूंगी। अभी प्रायश्चित पूरा नहीं हुआ है, इसलिए यह दुर्बलता हमारे पीछे पड़ी हुई है। मैं देख रही हूँ, यह हमारा सर्वनाश करके छोड़ेगी।

रमा के दिल पर कुछ चोट लगी । सिर खुजलाकर बोला——चाहता तो मैं भी हूँ कि किसी तरह इस मुसीबत से जान बचे । 'तो बचाते क्यों नहीं ? अगर तुम्हें कहते शर्म आती हो, तो मैं चलूँ । यही अच्छा होगा । मैं भी चली चलूंगी और तुम्हारे सुपरिटेंडेंट साहब से सारा सुत्तान्त साफ-साफ़ कह दूँँगी।'

रमा का सारा पशीपेश गायब हो गया । अपनी इतनी दुर्गति यह न कराना चाहता था कि उसकी स्त्री जाकर उसकी वकालत करे । बोला——तुम्हारे चलने की जरूरत नहीं है जालपा, मैं उन लोगों को समझा दूंगा।

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