पृष्ठ:ग़बन.pdf/२६५

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br>हलफ़ से कहता हूँ, आप लोग आदमी को पहचानते तो है नहीं, लगते है रोब जमाने । इस तरह गवाही देना हर एक समझदार आदमी को बुरा मासूस होगा। कुदरती बात है । जिसे जरा भी इज्जत का खयाल है, वह पुलिस के हाथों की कठपुतलो बनना पसंद न करेगा। बाबू साहब की जगह मैं होता, तो मैं भी ऐसा करता, लेकिन इनका मतलब यह नहीं कि वह हमारे खिलाफ़ शहादत देंगे। आप लोग अपना काम कीजिए, बाबू साहब की तरफ से बेफिक रहिए, हलफ़ से कहता हूँ।

उसने रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला——आप मेरे साथ चलिए वाबूजी, आपको अच्छे रिकार्ड सुनाऊँ।

रमा ने रूठे हुए बालक की तरह हाथ छुड़ाकर कहा——मुझे दिक न कीजिए, इंस्पेक्टर साहब । मब तो मुझे जेलखाने में मरना है ।

इंस्पेक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा—— आप क्यों ऐसी बातें मुँह से निकालते हैं साहब ! जेलखाने में मरें आपके दुश्मन !

डिप्टी ने तसमा भी बाक़ी न छोड़ना चाहा । बड़े कठोर स्वर में बोला, मानो रमा से कभी का परिचय नहीं हैं—— साहब, यों हम बाबू साहब के साथ सब तरह का सलूक करने को तैयार है। लेकिन जब वह हमारे खिलाफ गवाही देगा, हमारा जड़ खोदेगा, तो हम भी अपनी कार्रवाई करेगा। जरूर से करेगा । कभी छोड़ नहीं सकता।

इसी वक्त सरकारी एडवोकेट और बैरिस्टर मोटर से उतरे ।

४१

रतन पत्रों में जालपा को तो ढाडस देती रहती थी; पर अपने विषय में कुछ न लिखती थी । जो आफ ही ब्यथित हो रही हो, उसे अपनी व्यथानों की कथा क्या सुनाती ! वही रतन जिसने रुपयों की कभी कोई हकीकतन समझी, इस एक ही महीने में रोटियों की भी मुहताज हो गयी थी। उसका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी न हो, पर उसे किसी बात का प्रभाव न था। , मरियल घोड़े पर सवार होकर भी यात्रा पुरी हो सकती है अगर सड़क अच्छी हो, नौकर-चाकर, रुपये-पैसे और भोजन आदि की सामग्री साथ हो । घोड़ा भी तेज हो, तो पूछना ही क्या । रतन की दशा उसी सवार की सी थी, उसी सवार की भांति वह मन्दगति से अपनी जीवन-यात्रा कर रही थी। कभी–