पृष्ठ:ग़बन.pdf/२६८

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और मेरे पिताजी में कभी अलगौझा नहीं हुआ । चाचाजी यहाँ थे, हम लोग इन्दौर में थे; पर इससे यह नहीं सिद्ध होता, कि हममें अलगौझा था। अगर चाचा अपनी संपत्ति आपको देना चाहते, तो कोई वसीयत अवश्य लिख जाते, और यघपि वह वसीयत कानून के अनुसार कोई चीज़ न होती, पर हम उसका सम्मान करते । उनका कोई वसीयत न करना साबित कर रहा है कि वह कानून के साधारण व्यवहार में कोई बाधा न डालना चाहते थे। आज आप को बंगला खाली करना होगा । मोटर और अन्य वस्तुएँ भी नीलाम कर दी जायेंगी । आपकी इच्छा हो, मेरे साथ चलें या यहाँ रहें। यहाँ रहने के लिए आपको दस-ग्यारह रुपये का मकान काफ़ी होगा। गुजारे के लिए पचास रुपये महीने का प्रबन्ध मैंने कर दिया है । लेना-देना चुका लेने के बाद इससे ज्यादा की गुंजाइश ही नहीं।

रतन ने कोई जवाब न दिया । कुछ देर वह हतबुद्धि-सी बैठी रही, फिर मोटर मंगवायी और सारे दिन वकीलों के पास दौड़ती फिरी। पंडितजी के कितने ही वकील मित्र थे। सभी ने उसका वृत्तान्त सुनकर खेद प्रकट किया। और वकील साहब के वसीयत न लिख जाने पर हैरत करते रहे। अब उसके लिए एक ही उपाय था । वह यह सिद्ध करने की चेष्टा करे, कि वकील साहब और उनके भाई में अलहदगी हो गयी थी। अगर यह सिद्ध हो गया, और यह सिद्ध हो जाना बिल्कुल आसान था, तो रतन उस सम्पत्ति की स्वामिनी हो जायेगी । अगर वह यह सिद्ध न कर सकी, तो उसके लिए कोई चारा न था।

अभागिनी रतन लौट आयी ! उसने निश्चय किया, जो कुछ मेरा नहीं है, उसे लेने के लिए मैं झूठ का आश्रय न लूंगी । किसी तरह नहीं। मगर ऐसा कानून बनाया किसने ? क्या स्त्री इतनी नीच, इतनी तुच्छ, इतनी नगण्य है ? क्यों ?

दिन भर रतन चिन्ता में डूबी, मौन बैठी रही। इतने दिनों वह अपने को इस घर की स्वामिनी समझती रही। कितनी बड़ी भूल थी। पति के जीवन में जो लोग उसका मुंह ताकते थे, वे आज उसके भाग्य के विधाता हो गये । यह घोर अपमान रतन-जैसी मामिनी स्त्री के लिए असह्य था । माना, कमाई पंडितजी की थी, पर यह गाँव तो उसी ने खरीदा था, इनमें कई मकान तो उसके सामने ही बने । उसने यह एक क्षण के लिए भी न

                                   

ग़बन
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