पृष्ठ:ग़बन.pdf/३०

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दया-झूठ कहते हो।

रमा-तो फिर क्या रख आऊँ?

रमा के इस प्रश्न ने दयानाथ को संकट में डाल दिया। झेंपते हुए बोले- अब क्या रख आओगे ? कहीं देख ले, तो गजब ही हो जाय । वही काम करोगे, जिसमें जग हँसाई हो । खड़े क्या हो, सन्दूकची मेरे बड़े सन्दूक में रख आयो और जाकर लेट रहो । कहीं जाग पड़े तो बस !

बरामदे के पीछे दयानाथ का कमरा था ! उसमें एक देवदार का पुराना सन्दूक रखा था। रमा ने सन्दूकची उसके अन्दर रख दी और बड़ी फुर्ती से ऊपर चला गया ! छत पर पहुँचकर उसने आहट ली, जालपा पिछले पहर की सुखद निद्रा में मग्न थी ।

रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिपट गयी। रमा ने पूछा-क्या है, तुम चौंक पड़ी।

जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नेत्रों से ताककर कहा-कुछ नहीं, एक स्वप्न देख रही थी। तुम बैठे क्यों हो, कितनी रात है अभी ?

रमा ने लेटते हुए कहा-सबेरा हो रहा है, क्या स्वप्न देखती थीं ?

जालपा-जैसे कोई चोर मेरे गहनों की सन्दूकची उठाये लिए जाता हो ।

रमा का हृदय इतने जोर से धक-धक करने लगा, मानों उस पर हथौड़े पड़ रहे हों । खून सर्द हो गया। परन्तु सन्देह हुआ, कहीं इसने मुझे देख तो नहीं लिया । वह जोर से चिल्ला पड़ा-चोर! चोर! नीचे बरामदे में दयानाथ भी चिल्ला उठे चोर ! चोर !

जालपा घबड़ाकर उठी । दौड़ी हुई कमरे में गयी, झटके से आलमारी खोली, सन्दूकची वहाँ न थी। मूछित होकर गिर पड़ी।

सबेरा होते ही दयानाथ गहने लेकर सराफ के पास पहुँचे और हिसाब होने लगा । सराफ़ के १५००) आते थे, मगर वह केवल १५००) के गहने लेकर सन्तुष्ट न हुआ। बिके हुए गहनों को वह बट्टे पर ही ले सकता था। बिकी हुई चीज कौन वापस लेता है ? जाकड़ पर दिये होते, तो दूसरी बात थी । इन चीजों का सौदा हो चुका था। उसने कुछ ऐसी व्यापारिक सिद्धान्त की बातें की, दयानाथ को कुछ ऐसा शिकंजे में कसा, कि बेचारे

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