पृष्ठ:ग़बन.pdf/३४

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रमा ने लोटा उठाया ही था कि जालपा में आकर उग्र भाव से कहा- मुझे मेरे घर पहुँचा दो, इसी वक्त ।

रमा ने लोटा रख दिया और उसकी ओर इस तरह ताकने लगा, मानों उसकी बात समझ में न आई हो ।

जागेश्वरी बोली-भला इस तरह कहीं बहू-बेटियाँ बिदा होती हैं, कैसी बात कहती हो बहू !

जालपा-मैं उन बहू-बेटियों में नहीं हूँ। मेरा जिस वक्त जी चाहेगा जाऊँगी, जिस वक्त जी चाहेगा आऊँगी। मुझे किसी का डर नहीं है । जब यहाँ कोई मेरी बात नहीं पूछता, तो मैं भी किसी को अपना नहीं समझती । सारे दिन अनाथों की तरह पड़ी रहती हूँ; कोई झांकता तक नहीं। मैं चिड़िया नहीं हूं, जिसका पिंजड़ा दाना-पानी रखकर बन्द कर दिया जाये । मैं भी आदमी हूँ ! अब इस घर में मैं क्षण-भर न रुकूंगी। अगर कोई मुझे भेजने न जायगा, तो अकेली चली जाऊंगी। राह में कोई भेड़िया नहीं बैठा है, जो मुझे उठा ले जायेगा और उठा भी ले जाय, तो क्या गम । यहाँ कौन-सा सुख भोग रही हूँ !

रमा ने सावधान होकर कहा-आखिर कुछ मालूम भी तो हो, क्या बात हुई ?

जालपा बात कुछ नहीं हुई, अपना जी है, यहाँ नहीं रहना चाहती है।

रमानाथ- भला इस तरह जाओगी तो तुम्हारे घरवाले क्या कहेंगे । कुछ यह भी तो सोचो।

जालपा-यह सब सोच चुकी हूँ, और ज्यादा नहीं सोचना चाहती हूँ। मैं जाकर अपने कपड़े बांधती हूँ और इसी गाड़ी से जाउंगी।

यह कहकर जालपा ऊपर चली गई । रमा भी पीछे-पीछे यह सोचता हुआ चला, इसे कैसे शान्त करूं?

जालपा अपने कमरे में लाकर बिस्तर लपेटने लगी कि रमा ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला-तुम्हें मेरी कसम जो इस वक्त जाने का नाम लो !

जालपा ने त्योरी चढ़ाकर कहा-तुम्हारी कसम की हमें कुछ परवा नहीं है ।

ग़बन
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