पृष्ठ:ग़बन.pdf/४०

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रमा- की मुझे परवा नहीं, रिश्वत कोई अच्छी चीज तो है नही।

रमेश -बहुत खराब, मगर बाल-बच्चों के आदमी क्या करें । तीस रुपयों में गुजर नहीं हो सकती। मैं अकेला आदमी हूँ। मेरे लिए डेढ़ सौ ही काफी है, कुछ बचा भी लेता हूँ। लेकिन जिस घर में बहुत-से आदमी हों, लड़कों को पढ़ाई हो, लड़कियों की शादियां हों, वह आदमी क्या कर सकता है। जब तक छोटे-छोटे आदमियों का वेतन इतना न हो जायेगा कि वह भलमनसी के साथ निर्वाह कर सकें तब तक रिश्वत बन्द न होगी । यही रोटी-दाल, घी-दूध, तो वह भी खाते हैं फिर एक को बीस रुपये और दूसरे को तीन सौ रुपये क्यों देते हो?

रमा का फर्जी पिट गया, रमेश बाबू ने बड़े जोर से कहकहा मारा।

रमा ने रोष के साथ कहा- अगर आप चुपचाप खेलते हैं तो खेलिये, नहीं तो मैं जाता हूं। मुझे बातों में लगाकर सारे मुहरे उड़ा लिये।

रमेश-अच्छा साहब, अब बोलूँ तो जबान पकड़ लीजिये यह लीजिये शय ! तुम कल अर्जी दे दो । उम्मेद तो है, तुम्हें यह जगह मिल जायेगी; मगर जिस दिन जगह मिले, मेरे साथ रात भर खेलना होगा।

रमा-आप तो दो ही मातों में रोने लगते हैं।

रमेशल-अजी, वह दिन गये, जब आप मुझे मात दिया करते थे। आजकल चन्द्रमा बलवान है। इधर मैंने एक मन्त्र सिद्ध किया है । क्या मजाल कि कोई मात दे सके ! फिर शय !

रमा-जी तो चाहता है, दूसरी बाजी मात देकर जाऊँ, मगर देर होगी।

रमेश-देर क्या होगी। अभी तो नौ बजे है। खेल लो, दिल का अरमान निकल जाय ! यह शय और मात !

रमा-अच्छा कल की रही । कल ललकारकर पांच मातें न दी तो कहिएगा।

रमेश-अजी, जाओ भी; तुम मुझे क्या मात दोगे ? हिम्मत हो सो अभी सही।

ग़बन
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