पृष्ठ:ग़बन.pdf/४३

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मैं नौकर हुआ, तो तुम्हारी ही उम्र मेरी भी थी, और शादी हुए तीन ही महीने हुए थे। जिस दिन मेरो पेशी होने वाली थी, ऐसा घबराया हुआ था, मानों फांसी पाने जा रहा हूँ, अगर तुम्हें डरने का कोई कारण नहीं हैं। मैं सब ठीक कर दूंगा।

रमा-अापको तो बीस-बाईस साल नौकरी करते हो गये होंगे?

रमेश-पूरे पच्चीस हो गये साहब बीस बरस तो स्त्री का देहान्त हुए हो गये । दस रुपये पर नौकर हुआ था ।

रमा-आपने दूसरी शादी क्यों नहीं की ? तब तो आपकी उम्र पच्चीस से ज्यादा न रही होगी।

रमेश ने हंसकर कहा- बरफी खाने के बाद गुड़ खाने का किसको जी चाहता है ? महल का सुख भोगने के बाद झोपड़ा किसे अच्छा लगता है ? प्रेम आत्मा को तृप्त कर देता है । तुम तो मुझे जानते हो, अब तो बूढ़ा हो गया है, लेकिन मैं तुमसे सच कहता हूँ, इस विधुर जीवन में मैंने किसी स्त्री की ओर अाँख तक नहीं उठाई। कितनी ही सुन्दरियाँ देखीं, कई बार लोगों ने विवाह के लिए घेरा भी; लेकिन इच्छा ही न हुई। उस प्रेम की मधुर स्मृतियों में मेरे लिए प्रेम का सजीव आनन्द भरा हुआ है।

यों बातें करते हुए, दोनों आदमी दफ्तर पहुँच गये।

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रमा दफ्तर से घर पहुँचा, तो चार बज रहे थे । वह दफ्तर ही में था कि आसमान पर बादल घिर आये । पानी आया ही चाहता था; पर रमा को घर पहुंचने की इतनी बेचैनी हो रही थी कि उससे रुका न गया। हाते के बाहर भी न निकलने पाया था कि जोर की वर्षा होने लगी। आषाढ़ का पहला पानी था, एक क्षण में वह लथ पथ हो गया । फिर भी वह कहीं रुका नहीं। नौकरी मिल जाने का शुभ समाचार सुनाने का आनन्द इस दौगड़े की क्या परवा कर सकता था ? वेतन तो केवल तीस रुपये थे; पर जगह आमदानी की थी। उसने मन-ही-मन हिसाब लगा लिया था, कि कितनी मासिक बचत हो जाने से वह जालपा के लिए चन्द्रहार बनवा सकेगा। अगर पचास-साठ रुपये महीने भी बच जाये, तो पांच साल में जालपा गहनों से लद जायेगी । कौन-सा आभूषण कितने का होगा, इसका भी उसने अनुमान

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