पृष्ठ:ग़बन.pdf/४४

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कर लिया था। घर पहुँचकर उसने कपड़े भी न उतारे, लथ-पथ जालपा के कमरे में पहुँच गया।

जालपा उसे देखते ही बोली-यह भींग कहाँ गये, रात कहाँ गायब थे?

रमा०-इसी नौकरी की फिक्र में पड़ा हुआ हूँ ! इस वक्त दफ्तर से चला आता हूँ। म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर में मुझे एक जगह मिल गयी !

जालपा ने उछलकर पूछा-~-सच, कितने की जगह है ?

रमा को ठोठ-ठीक बतलाने में संकोच हुआ। तीस की नौकरी बताना अपमान की बात थी। स्त्री के नेत्रों में तुच्छ बनना कौन चाहता है ? बोला-अभी तो चालीस मिलेंगे, पर जल्द तरक्की होगी। जगह आमदनी की है।

जालपा ने उसके लिए किसी बड़े पद को कल्पना कर रखी थी। बोली -चालीस में क्या होगा! भला सत्तर तो होते ?

रमा०--मिल तो सकती थी सौ रुपये की भी; पर यहाँ रोब है, और आराम है। पचास-साठ रुपये ऊपर से मिल जायेंगे।

जालपा-तो तुम घूस लोगे, गरीबों का गला काटोगे ?

रसा ने हँसकर कहा-नहीं त्रिये, वह जगह ऐसी नहीं कि गरीबों का गला काटना पड़े। बड़े-बड़े महाजनों से रकमें मिलेंगी और वह खुशो से गले लगायेंगे। मैं जिसे चाहूँ दिन भर दफ्तर में खड़ा रखूँ। महाजनों का एक-एक मिनट अशरफी के बराबर है। जल्द-से-जल्द अपना काम कराने के लिए वे खुशामद भी करेंगे, पैसा भी देंगे।

जालपा सन्तुष्ट हो गयी, बोली-हाँ, तब ठीक है। गरीबों का काम यों ही कर देना।

रमा०-वह तो करूंगा ही।

जालपा-अम्माजी से तो नहीं कहा ? जाकर कह आओ। मुझे तो सबसे बड़ी खुशी यही है कि मालूम होगा कि यहाँ मेरा भी कोई अधिकार है।

रमा-हां, जाता हूँ: मगर उनसे तो मैं बीस ही बताऊँगा।

जालपा ने उल्लसित होकर कहा-हाँ जी; बल्कि पन्द्रह कहना, ऊपर की आमदनी की तो चर्चा हो करना व्यर्थ है। भीतर का हिसाब से ले सकते हैं। सबसे पहले चन्द्रहार बनवाऊँगी।

ग़बन
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