पृष्ठ:ग़बन.pdf/४६

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खुशी से नहीं दे रही हैं । बहुत संभव है कि इसे भेजते समय वह रोई भी हों और इसमें तो कोई संदेह हो नहीं कि इसे वापस पाकर उन्हें सच्चा आनन्द होगा । देनेवाले का हृदय देखना चाहिए । प्रेम से यदि वह मुझे एक छल्ला भी दे दें, तो मैं दोनों हाथों से ले लूँ । जब दिल पर बन करके दुनिया की लाज से या किसी के धिक्कारने से दिया, तो क्या दिया । दान भिखारिनियों को दिया जाता है । मैं किसी का दान न लूंगी, चाहे वह माता ही क्यों न हों।

माता के प्रति जालपा का यह द्वेष देखकर रमा और कुछ कह न सका द्वेष तर्क और प्रमाण नहीं सुनता । रमा ने हार ले लिया, और चारपाई से उठता हुआ बोला-जरा अम्मा और बाबूजी को तो दिखा दूँ। कम-से-कम उमसे पूछ तो लेना ही चाहिए ।

जालपा ने हार उसके हाथ से छीन लिया, ओर बोली- वे लोग मेरे कौन होते हैं, जो उनसे पूछूँ? केवल एक घर में रहने का नाता है । जब मुझे कुछ नहीं समझते, तो मैं भी उन्हें कुछ नहीं समझती।

यह कहते हुए उसने हार को उसी डिब्बे में रख दिया, और उस पर कपढा़ लपेटकर सीने लगी। रमा ने एक बार डरते-डरते फिर कहा-ऐसी जल्दी क्या है, दस-पांच दिन में लौटा देना : उन लोगों की भी खातिर हो जायेगी।

इस पर जालपा से कठोर नेत्रों से देखकर कहा-जब तक मैं इसे लौटा न दूंगी, मेरे दिल को चैन न पायेगा। मेरे हृदय में काँटा-सा खटकता रहेगा। अभी पारसल तैयार हुआ जाता है, हाल ही लौटा दो।

एक क्षण में पारसल तैयार हो गया और रना उसे लिये हुए चिन्तित भाव से नीचे चला।

११

महाशय दयानाथ को जब रमा के नौकर हो जाने का हाल मालूम हुआ तो बहुत खुश हुए। विवाह होते ही वह इतनी जल्दी चेतेगा इसकी उन्हें आशा न थी। बोले-जगह तो अच्छी है। ईमानदारी से काम करोगे, तो किसी अच्छे पद पर पहुँच जाआगे । मेरा यही उपदेश है कि पराये पैसे को हराम समझना।

ग़बन
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