पृष्ठ:ग़बन.pdf/६१

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को पूछ-पूछकर भोजन दिया जाये। उस वक्त मुझे ध्यान न रहा कि संकोच में आदमी इच्छा होने पर भी 'नहीं नहीं' करता है। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हें बहुत दिन तक इन्तजार न करना पड़ेगा। ‌ जालपा ने सचिन्त नेत्रों से देखकर कहा- सो क्या उधार लाओगे?

रमा- हाँ, उधार लाने में कोई हर्ज नहीं है। जब सूद नहीं देना है, तो जैसे नकद वैसे उधार! ऋण से दुनिया का काम चलता है। कौन ऋण नहीं लेता ? हाथ में रुपया आ जाने से अलल्ले-सलल्ले खर्च हो जाते हैं। कर्ज सिर पर सवार रहेगा तो उसकी चिन्ता हाथ रोके रहेगी।

जालपा- मैं तुम्हें चिन्ता में नहीं डालना चाहती। अब मैं भूलकर भी गहनों का नाम न लूंगी।

रमा०- नाम तो तुमने कभी नहीं लिया, लेकिन तुम्हारे नाम न लेने से मेरे कर्तव्य का अन्त नहीं हो जाता। तुम कर्ज से व्यर्थ इतना डरती हो। रुपये जमा होने के इन्तजार में बैठा रहूँगा, तो शायद कभी न जमा होंगे। इसी तरह लेते देते साल में तीन-चार बार चीजें बन जायेंगी।

जालपा- मगर पहले कोई छोटी-सी चीज लाना।

रमा०- हाँ,ऐसा तो करूँगा ही।

रमा बाजार चला सो खूब अँधेरा हो गया था। दिन रहते जाता तो संभव था, मित्रों में किसी की निगाह उस पर पड़ जाती। मुंशी दयानाथ ही देख लेते ! वह इस मामले को गुप्त ही रखना चाहता था।

१३

सराफ़े में गंगू की दुकान मशहूर थी। गंगू था तो ब्राहाण, पर बड़ा हो व्यापार-कुशल। उसको दुकान पर नित्य ग्राहकों का मेला लगा रहता था। उसकी कर्म-निष्ठा ग्राहकों में विश्वास पैदा करती थी। और दुकानों पर ठगे जाने का भय था। वहाँ किसी तरह का धोखा न था। गंगू ने रमा को देखते ही मुस्कराकर कहा-आइये बाबूजी, ऊपर आइए। बड़ी दया की। मुनीमजी, आपके वास्ते पान मँगवाओ! क्या हुक्म है बाबूजी, आप तो जैसे मुझसे नाराज़ हैं। कभी आते ही नहीं, गरीबों पर कभी-कभी दया किया कीजिये।

गंगू की शिष्टता ने रमा की हिम्मत खोल दी। अगर उसने इतने आग्रह

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गंबन