पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१०२

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मौलवी मुहम्मद हुसेन आज़ाद जमातोंमें दाखिल हुए। यह दोनों जमान देहली कालिजमें जुदा-जुदा थीं। वह अरबीकी अव्वल जमात तक पढ़े। ज़ोकके शागिर्दै रशीद५६ थे। उर्दूकी नज्मो नसर लिखनेमें इनको इसतदाद १७ कालिज ही में हासिल होगई थी। वह कालिज छोड़कर देहलीकी कचहरीमें रोज़नामचा नवीस हुए। इनका खानदान मोअज़िज़ था । वह मुग़ल थे। फारसी ज़बान इनके घरमें इस सबबसे बोली जाती थी कि इनकी मां ईरानी थीं। सन् १८५७ के ग़दरके बाद जब अंग्रेज़ोंने देहली फतह की तो उन्होंने देहली छोड़ी। फिर इसमें आनकर आबाद नहीं हुए। लाहौरमें वह कालेजके प्रोफेसर अरबी फारसीके थे। उन्होंने दो पोलिटिकल सफ़र ईरान और वदखशांके किये ! सन १८८७ में वह दीवाने होगये। अबतक वह इसी हालमें हैं। अब इनकी उम्र ७८ सालकी हैं।" मौलाना मोहम्मद ज़काउल्ला साहबने सिर्फ यही हालात बयान फरमाये। आगे वह चुप हो गये, मगर बराह इनायत एक ऐसे बुज़ग- का पता बताया जिनसे 'आज़ाद'का बहुत ताल्लक था और जो उनके मोहसिन ५८ थे । मेरे लायक दोस्त पंडित हरनारायण शास्त्री हिन्दृ कालिज देहलीके संस्कृतके प्रोफेसरने इनकी खिदमतमें हाज़िर होकर बहुत-सी बातें मालूम की, वह नीचे लिखी जाती हैं । आज़ादकी तालीम 'आज़ाद'के वालिद मौलवी मुहम्मद बाक़रका घर देहलीमें काश्मीरी दरवाजा बहरामखाँकी खिड़कीमें था। अबतक वहाँ इनका इमामबाड़ा मौजूद है। गदरमें वह इनके हाथसे निकल गया था। मगर अब सुना है कि 'आज़ाद'के साहबज़ादे मुहम्मद इब्राहीम साहब मुंसिफ लाहौरने इसे सरकारसे वागुज़ाश्त - ९ कराके अपने दखलमें कर लिया है। वहीं ५६-प्रधान शिष्य । ५७-क्षमता । ५८-उपकारो। ५९-वापस लेकर । [ ८५ ]