पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१०८

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मौलवी मुहम्मद हुसेन आज़ाद पोलिटिकल मुसाफिरत पंडित मनफूल * सन १८६४-६५ में मीरमुंशी थे। सन १८६६-६७ में उन्होंने बदखशांका पोलिटीकल सफ़र किया । 'आज़ाद'को साथ ले गये । 'आज़ाद' बदखशांसे लौटकर सरकारी अखबार और 'अतालीक़ पञ्जाब' के असिसटेन्ट एडीटर हुए। अफसोस, अपनी सय्याहतके मुताल्लिक उन्होंने कोई किताब न लिखी। सिर्फ कहीं २ कुछ इशारे किये हैं। अपनी बनाई फारसीकी दृसरी किताबमें किसी मय्याह८१ के नामसे एक कहानी लिखी है। मालूम हुआ कि वह आपके पहिले सफ़रसे मुताल्लिक एक सरगुज़श्त८२ है। सरकारी अखबार सन १८७६ में निकला था, जो जल्द बन्द कर दिया गया। बादमें रिसाला 'अता- लीक़ पञ्जाब' निकला, वह कोई दो साल जारी रहा। इन दोनोंके कुछ पचे तलाश किये थे, मगर न मिले । मास्टर साहबके पास थे, मगर कोई साहब मांगकर ले गये। फिर वापिस देने न आये । दृसरी दफ़ा आज़ादने ईरानका सफर किया था। यह सफ़र सन १८८७ से कुछ पहिले खत्म हो गया था। इसके बाद मलका विकोरिया- ८१-यात्री। ८२-विवरण।

  • मनफूल मेरठ के पास किसी गांवके रहनेवाले एक गरीब गौड़ ब्राह्मणके लड़के

थे। इसके वालिद तलाशरिजकमें देहलो आये थे। यहां आकर पंडित मनफूल देहली कालिजमें पड़े-इन का घर भी कश्मीरी दरवाज़ा पर था-और दरीबामें भी रहते थे। आपके ६ लड़के हुए । बड़े वीरबल लाहौर में मरे-दूसरे चन्द्रबल पंजाब- में इक्स्ट्रा असिस्टेन्ट कमिश्नर थे। तीसरे सूरजबल बी० ए० बैरिस्टर एट-ला एल० एल० डी० पहिले जम्नूके गवर्नर थे। अब वहाँकी कौंसिलके सेक्रेटरी हैं। आप सात साल विलायतमें रहे। चौथे महेशबल जम्मूमें मर गये। पांचवे नारा- यणबल लाहौरमें हैं। अपनी पुरानी जायदादका इन्तज़ाम करते हैं। छठे गणेशबल जयपुरमें हैं।