पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१२६

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हिन्दी-भाषाकी भूमिका १८७८ ई० में उक्त राजा साहबने रघुवंशका गद्य हिन्दीमें अनुवाद किया। उसकी भूमिकामें वह लिखते हैं- "हमारे मतमें हिन्दी और उर्दू दो बोली न्यारी न्यारी हैं। हिन्दी इस देशके हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँके मुसलमानों और पारसी पढ़े हुए हिन्दुओं की बोलचाल है। हिन्दीमें संस्कृतके पद बहुत आते हैं, उट्टमें अरबी पारसीके । परन्तु कुछ आवश्यक नहीं है कि अरबी पारसीके शब्दों बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषाको हिन्दी कहते हैं, जिसमें अरबी पारसीके शब्द भरे हों। इस उल्थामें यह भी नियम रक्खा गया है कि कोई पद अरबी पारसीका न आवे ।” राजा साहब उर्दू फारसी भलीभांति जानते थे, तिसपर भी हिन्दी और उर्द्रको केवल इसलिये दो न्यारी न्यारी बोली बताते थे कि एकमें संस्कृतकं शब्द अधिक होते हैं और दूसरीमें फारसी अरबीके शब्द । अस्तु, इस कथनसे यह स्पष्ट है कि हिन्दी और उर्दृमें केवल संस्कृत और फारसी आदिके शब्दोंके लिये भेद है और सब प्रकार दोनों एक हैं । साथही यह भो विदित होता है कि उसे उस समय कुछ शिक्षित हिन्दु घबराने लगे थे और समझने लगेथे कि फारसी, अरबी शब्दोंके बहुत मिल जानेसे हिन्दी हिन्दी नहीं रही कुछ और ही होगई, हिन्दुओंके काम वह नहीं आ सकती। ईश्वरकी इच्छा थी कि हिन्दीकी रक्षा हो, इसीसे यह विचार कुछ शिक्षित हिन्दुओंके हृदयमें उसने अंकुरित किया । गिरती हुई हिन्दीको उठानेके लिये उसकी प्रेरणासे स्वर्गीय भारतेन्दु वाबू हरिश्चन्द्रका जन्म हुआ। __हरिश्चन्द्रने हिन्दीको फिरसे प्राण-दान किया। उन्होंने हिन्दी में अच्छे अच्छे समाचारपत्र, मासिकपत्र आदि निकाले और उत्तम उत्तम नाटकों और •पुस्तकोंसे उसका गौरव बढ़ाना आरम्भ किया। यद्यपि उन्होंने बहुत थोड़ी आयु पाई और सतरह अठारह वर्षसे अधिक हिन्दीकी [ १०९ ]