पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१३०

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हिन्दी-भाषा मुसलमानोंसे साथ होगया था। बहुतसी नई चीजें, जो मुसलमानांके साथ इस देशमें आई थीं, उनके नाम भी नये थे । वह नाम यहाँके लोगोंको सीखने पड़े, जो पीछे यहाँको भाषामें मिल गये। और भी कई कारण हैं। भिन्न भाषाओंके बहुत शब्द ऐसे होते हैं कि यदि उनका अपनी भाषामें अनुवाद किया जावे तो मतलब एक वाक्यमें पूरा हो और फिर भी ठीक आनन्द प्राप्त न हो । ऐसी दशामें वह शब्द ज्योंका त्यों बोलना पड़ता है। फिर दो भिन्न भिन्न भाषा बोलनेवालोंको कभी कभी जल्दी बोलनेके लिये या सरलतासे बात समझा देनेके लिये एक दुसरेके शब्द बोल जानेपर लाचार होना पड़ता है। और जब आपसमें भलीभांति मेल-जोल होजाता है, तब तो एक दुसरेके शब्द खूबही उनके मुंहसे निक- लने लगते हैं। कभी प्रेमसे कभी दिल्लगीके लिये एक दुसरेके शब्दोंकी अदल बदल होतो है । सबसे बड़ा कारण एक और यह है कि विजेता लोगों- की बोल-चाल रङ्ग-टङ्ग और दूसरी दृमरी वात विजित लोगोंको बहुत भली मालूम होती हैं। उनका न वह केवल अनुकरण ही करते हैं, बरंच वैसा करनेमें लाभ दिखाते हैं और उनकी चालपर चलकर प्रसन्न होते हैं। यहाँ तक कि कभी कभी ऐसा करने में अपनी बड़ाई समझते हैं। आज कल अंग्रजोंकी प्रत्येक बात हमारे देशके शिक्षित और अशिक्षित लोगों- को जैसी भली जान पड़तो है और उनकी नकल करके जैसे वह कृतार्थ होते हैं, यही दशा मुसलमानी समयमें भी हो चुकी है । मुसलमानी चाल- पर उस समय बहुत लोग लट्ट थे, जिसके चिन्ह अब तक नहीं मिटे हैं। इन्हीं कारणोंसे फारसी हिन्दीमें मिलने लगी। किन्तु दुःखकी बात यह है कि उस कालकी बनी पुस्तके या लेख ऐसे नहीं मिलते, जिनसे तबको भाषाका रंग-ढंग मालूम हो सके और इस बातका पता लग सके कि किस आक्रमणकारीके समयमें इस देशकी भाषामें क्या परिवर्तन हुआ तथा किस सीमा तक मुसलमानी भाषा [ ११३ ]