पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१४३

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गुप्त-'नबन्धावली राष्ट्र-भाषा और लिपि बेटी तेरा भाई तो बालारी, कि सावन आया । अम्मा मेरे मामूको भेजोरी, कि सावन आया । बटी तेरा मामू तो बांकारी, कि सावन आया। इस गीतमें बेटी मातासे कहती है कि मा ! सावन आगया पिताको भेजो मुझे आकर लेजाय। माने उत्तर दिया कि वह बूढ़ा है। तब कहा भाईको भेजो तो उत्तर दिया कि वह बालक है। तब लड़की कहती है मामाको भेजो वह तो न बूढा है न बालक। तब माता कहती है कि वह मेरी सुनताही नहीं। कैसी सुन्दर रीतिसे भारतवर्पकी छोटी छोटी लड़कियोंके हृदयके विचार इस गीतमें दिग्वाये हैं। मुकरी या मुकरनीका अमीर खुसरू मानो आविष्का था : ---- सगरी ग्न मोह संग जागा। भोर भई तो बिछरन लागा। वाके बिछरे फाटत हीया । ए सखी ! साजन ? ना सखी दोया । सब सलूना सब गुन नीका । वा बिन सब जग लागे फीका । वाके सिर पर होवे कोन । ए सखी ! साजन ? ना सखी लोन । वह आवे तब शादी होय । उस बिन दृजा और न कोय । मीठे लागं वाके बोल । क्यों सखी ! माजन ? ना सखी ढोल । अब मुकरनियोंका रिवाज दिल्लीमें भी कम हो गया है, तथापि यह ढङ्ग इतना प्रिय था कि बाबू हरिश्चन्द्रजीने भी कई एक मुकरनियाँ लिखी हैं। एक अनमिल चलाया था। उसका नमूना लीजिये-एक कूप- पर चार पनहारियां पानी भर रही थीं। अमीर खुसरू उधरसे जाता था ! प्यास लगी। कुट पर आया। पानी मांगा। उनमेंसे एक उसे पहचानती थी। उसने कहा देखो यह खुसरू है । उन्होंने पूछा फ्या तू खसरू है ? तेरेही बनाये गीत सब गाते हैं, पहेलियां मुकरनियाँ तूही बनाता है ? उसने कहा-हाँ । तब एकने कहा-मुझे खीरकी बात [ १२६ ]