पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१५२

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हिन्दी-भाषा में कितनेही अच्छे हिन्दुओंके घरों में अभी वह बोली बोली जाती है । उक्त कवि शेरशाह सूरीके समयमें था। जान पड़ता है कि हुमाय बादशाह उस समय भारतसे भागकर ईरान जा चुका था। क्यों- कि मलिक मुहम्मद अपनी पोथीमें शेरशाहकाही डका बजाता है। कहता है- सेरसाह दिल्ली सुलतानू -चारों खण्ड तपो जस भानू । ओही छाज छातिओ पाटा- सब राज भुईधरा लिलाटा । जात सूर औ ग्वांडे सूरा -औ बुधवन्न सबै गुन पूग। तह लग राज ग्वरग कर लीन्हा-सिकंदर ‘जुलकर' नयन जो कीन्हा । हाथ ‘सुठेमां' केर अंगूठी --जग कहे दान दीन्ह भर मूठी। औ अति गरू भूमि पत भारी-टेक भूमि सव सृष्टि सँभारी। देहि असीस मुहम्मद, करहु जुगन जुगराज । बादसाह तुम जगतके,जग तुम्हार 'मुहताज' । शेरशाहके सैन्यबल, न्याय और प्रतापका वर्णन कवि इस प्रकार करता है-- वरनउँ सूर भूमि पत राजा-भूमि न भार सहै जो साजा । हय मय संन चले जगपूरी-परवत टूटि उडहिं होय धूरी। परी रेनु होय रविही ग्रासा-मानुख पेख लेहि फिर बासा । अँइ उड़ अन्तरिच्छ मृत मण्डा--ऊपर होय छावा महि मण्डो । डोले गगन ईन्द्र डर कांपा - बासुकी जाय पतालहि चांपा ! मेरु धसमसेमुस सुखाई-बनखंड टूटि खेह मिल जाईं। जो गढ़ नये न काहु चलत होय सब चूर । जो वह चढ़े भूमिपत शेरशाह जग सूर । 'अदल' कहों प्रथमैं दस होय -- चांटा चलत न दुखवै कोय । 'नौसेरवां' जो 'आदिल' कहा-'साह' अदल सर सौंहि न रहा। [ १३५ ]