पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१६५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


गुप्त-निबन्धावली राष्ट्र-भाषा और लिपि अक्षरोंही में उसे लिखने लगे और फारसी छन्दोंहीमें कविता करने लगे। यदि हिन्दू लोग इस भापाको देवनागरी अक्षरों में लिखते और अपने दोहा-चौपाई-सवैया आदि छन्दोमें कविता रचते, तो इस समय नई हिन्दीकी कविता भी बहुत मिलती। पर हिन्दीके कवि अपनी ब्रज- भाषाही में कविता करते रहे । और क्यों न करते, ब्रजभाषाही तो उस समय भारतवर्षकी भाषा थी । यहाँ तक कि बङ्गदेशके प्राचीन कवियोंकी कविता भी ब्रजभाषाहीमें है। अब थोड़े दिनसे आधुनिक बङ्गभाषामें कविता होने लगी है। __ मुसलमानोंमेंसे भी कुछका ध्यान ऊपर लिखी बातोंकी ओर गया है। उन्होंने कठिन उहीमें नहीं, सरलमें भी कविताकी है, तथा ब्रजभाषामें भी की है। साथ ही यह भी किया है कि हिन्दीके दोहा- चौपाई आदि छन्द रखकर सरल-सरल उद्देकी कविताको सजाया है । -भारतमित्र १९०१ ई. [ १४८ ]