पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१६७

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गुप्त-निबन्धावली राष्ट्र-भाषा और लिपि 'ज्वाद' 'जोय'का फर्क रखना मंजूर नहीं है, तो बिन्दी लगानेकी जरूरत नहीं और यदि उन सबमें भेद समझा जाता है, तो फिर 'जाल' 'ज्वाद' 'जोय' की कुछ पहचान रहनी चाहिये। नागरी-प्रचारिणी सभावालोंसे हमारा यह प्रश्न है कि इस बिन्दीसे उद न जाननेवालोंका क्या उप- कार होता है ? वह कैसे जानेंगे कि किस शब्दके नीचे बिन्दी लगाना चाहिये ? क्या आप लोग बिन्दी लगा लगाकर उर्दू शब्दोंका उनके लिये कोष तैयार कर दंगे ? और हिन्दी पड़े हुए उसे मियां मिट्ठ की तरह दिन- भर रटा करेंगे ? यदि ऐसा होगा तब तो आप लोगोंकी हिन्दी खुदाके फजलसे उर्दूसे भी सरल हो जायगी और तीन महीनेकी जगह तीन-तीये नौ वर्षमें सोखी जायगी और यदि उर्दू न जाननेवालोंको 'बिन्दी' न आवेगी तो आप लोगोंकी हिन्दीमें लबड़-धौधौं मच जायगी। कोई 'बिन्दी' लगावेगा, कोई नहीं लगावेगा। बिन्दीकी बीमारी नागरीप्रचारिणी-सभाके जन्मके पहले भी लोगोंमें हो चुकी है। बृन्दावन-निवासी पण्डित राधाचरणजी गोस्वामीने नाग- रीदासजी-कृत 'इश्क चमन' छापा था। उसमें उन्होंने उर्दू शब्दोंमें खूब बिन्दीकी भरमार की थी, यहाँ तक कि जिन शब्दोंके नीचे बिन्दी नहीं लगानी चाहिये, उनके नीचे भी उन्होंने 'बिन्दी' लगादी थी। स्वर्गवासी पण्डित प्रतापनारयण मिश्र उसे पढ़ते पढ़ते लोट-पोट हो गये थे और कहा था कि 'यह 'बिन्दी' की बीमारी हिन्दीवालोंको अच्छी लगी ! यह उनको दूर तक खराब करेगी।' नागरी प्रचारिणी सभाहीके मेम्बरोंमें एक बहुत बड़े आदमी हैं, जो अंग्रेजी-हिन्दीके बड़े पण्डित हैं। वह वकील शब्दमें 'बड़ा काफ' बोलते थे। वह यह समझते थे कि 'बड़ा काफ' बोलनेहीसे उर्दू हो जाती है। हमने उनको समझाया कि साहब ! वकील 'छोटे काफ' सेही है, बड़से नहीं। इसी तरह बिन्दीकी बीमारीमें पड़कर उर्दू न जाननेवालोंको बड़ी ठोकरें खानी पड़ती हैं । [ १५० ]