पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१७६

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भारतकीभाषा करि । भारतवर्ष मध्ये तांहाराई पाश्चात्य ज्ञानोपार्जने सर्वापेक्षा अधिक कृतकार्य हइयाछेन । ........ इंराजी भाषा द्वारा याहा हउक, किन्तु हिन्दि शिक्षा न करिले कोन क्रमेई चलिबेना। हिन्दि भाषाय पुस्तक ओ वक्तृता द्वारा भारतेर अधि- कांश स्थानेर मंगल साधन करिबेन, केवल बांगला ओ इंराजी चर्चाय हइबेना। भारतेर अधिवासीर संख्यार सहित तुलना करिले बांगला ओ इंराजी कयजन लोक बलिते व बुझिते पारेन ? बांगलार न्याय ये हिन्दीर उन्नति हइतेछेना इहा देशेर दुर्भाग्येर विपय। हिन्दी भापार साहाय्ये भारतवर्पर विभिन्न प्रदेशेर मध्ये यांहारा ऐक्यबंधन संस्थापन करिते पारिबेन तांहाराई-प्रकृत भारतवन्धु नामे अभिहित हइबार योग्य । सकले चेष्टा करून, यत्न करून, यत दिन परेई हङक मनोरथ पूर्ण हइबे।" १२८४ सालका बङ्गदर्शन जिसमें यह लेख लिखा गया है, हमारे पड़ोसमें चोरबगानकी यूनियन लाइब्ररीमें मौजूद है । प्रवासी उस नम्बर- को देखकर अपनी तसल्ली करले । अंग्रेज इस समय अंग्रेजीको संसार-व्यापी भाषा बना रहे हैं और सचमुच वह सारी पृथिवीको भापा बनती जाती है। वह बने, उसकी बराबरी करनेका हमारा मकदूर नहीं है, पर तो भी यदि हिन्दीको भारतवासो सारे भारतको भाषा बना सके तो अंग्रेजीके बाद दूसरा दर्जा पृथिवी पर इसी भाषाका होगा। -भारतमित्र सन् १९०४ ई. [ १५९ ।