पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१९२

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हिन्दुस्तानमें एक रस्मुलखत लार्ड कर्जनने सब जगह एक वक्त मुकर्ररकर दिया है। इसी तरह हम सब जगह एकही रस्मुलखत चाहते हैं । अगर कर्ज़न साहब एक वक्त- की जगह एक रस्मुलक़त जारी करा जाते तो हम उनके ज्यादा मशकूर ४३ होते। बंगालियोंको फितरतसेही अपने रस्मुलखतका पास है। मैं इसके लिये शिकायत नहीं करता। इसी तरह कुछ गुजराती भी अपने रस्मुलखतको आसान बताते हैं; क्योंकि उनके हरुफ़के सिरोंपर नागरी- की तरह लकीर नहीं लगाई जाती, इसी तरह कुछ मरहठे भी कहते हैं कि मरहठे हरुफ़हीमें संस्कृत लिखी जाती थी। ___ खैर. हमें वह रस्मुलखत अख्तियार करना चाहिये, जो आसान हो उम्दगीसे लिखा जाय और आँखोंको अच्छा मालूम हो। साथ ही जल्दी लिखनेके लिये उसमें आसानीसे कुछ हेर-फेर हो सकता हो । वह हिन्दुस्तानकी सब आर्य जुबानोंकी आवाज़ोंको ज़ाहिर कर सकता हो, और सबसे ज्यादा फैला हुआ हो । अम्बालाल शंकरलाल देशाई एम० ए०, एल० एल० बी० ने कहा।- शुरूमें गुजरातके स्कूलोंकी दरसी किताबोंमें नागरी और गुजराती दोनों हरुफ़ होते थे। इसलिये गुजराती स्कूलोंके तुलबा, नागरी हरुफ़से वाकिफ़ हैं। मगर अब सिर्फ गुजराती हरुफ़ ही, लोग रखना चाहते हैं। ऐसा करंगे तो बड़ी बदकिस्मतीकी बात होगी। प्रेसीडेन्ट साहबने कहा कि अच्छी-अच्छी किताब नागरी हरुफ़में छपं। बेशक यह बहुत उम्दा राय है। मेरे खयालमें साईन्सकी जो किताब गुजरातीमें तैयार हों वह सब नागरी हरुफ़में छपं । दूसरे सब तरहके तिजारती कामोंमें आयन्दा- से नागरी ख़तो-किताबत जारीकी जाय। अहमदाबाद वालोंने यह काम शुरू भी कर दिया है। सर भालचन्द्रकृष्णने ताईद करते हुए कहा कि हमारी सब संस्कृत [ १७५ ]