पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१९४

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शिवशम्भुके चिट्ठे और खत

(भारतमित्र ११ अप्रेल सन् १९०३ ई०)

बनाम लार्ड कर्जन (१)

माई लार्ड! लड़कपनमें इस बूढ़े भङ्गड़को बुलबुलका बड़ा चाव था। गांवमें कितनेही शौकीन बुलबुलबाज थे। वह बुलबुलें पकड़ते थे, पालते थे और लड़ाते थे, बालक शिवशम्भु शर्मा बुलबुल लड़ानेका चाव नहीं रखता था। केवल एक बुलबुलको हाथपर बिठाकरही प्रसन्न होना चाहता था। पर ब्राह्मणकुमारको बुलबुल कैसे मिले? पिताको यह भय कि बालकको बुलबुल दी तो वह मार देगा, हत्या होगी। अथवा उसके हाथसे बिल्ली छीन लेगी तो पाप होगा। बहुत अनुरोधसे यदि पिताने किसी मित्रकी बुलबुल किसी दिन ला भी दी तो वह एक घण्टेसे अधिक नहीं रहने पाती थी। वह भी पिताकी निगरानीमें!

सरायके भटियारे बुलबुल पकड़ा करते थे। गांवके लड़के उनसे दो दो तीन तीन पैसेमें खरीद लाते थे। पर बालक शिवशम्भु तो ऐसा नहीं कर सकता था। पिताकी आज्ञा बिना वह बुलबुल कैसे लावे और कहां रखे? उधर मनमें अपार इच्छा थी कि बुलबुल जरूर हाथपर हो। इसीसे जङ्गलमें उड़ती बुलबुलको देखकर जी फड़क उठता था। बुलबुलकी बोली सुनकर आनन्दसे हृदय नृत्य करने लगता था। कैसी कैसी कल्पनाएं हृदयमें उठती थीं। उन सब बातोंका अनुभव दूसरोंको नहीं होसकता। दूसरोंको क्या होगा? आज यह वही शिवशम्भु है, स्वयं

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