पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१९७

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गुप्त-निबन्धावली चिट्टे और खत सोनेका हौदा लगवाकर छत्र-धारण-पूर्वक सवार हुए थे, वह अपने कीमती असबाब सहित जिसका था, उसके पास चला गया। आप भी जानते थे कि वह आपका नहीं और दर्शक भी जानते थे कि आपका नहीं। दरबारमें जिस सुनहरी सिंहासनपर विराजमान होकर आपने भारतके सब राजा महाराजाओंकी सलामी लीथी, वह भीवहीं तक था और आप स्वयं भलीभांति जानते हैं कि वह आपका न था। वह भी जहांसे आया था वहीं चला गया। यह सब चीजे खाली नुमायशी थीं। भार- तवर्षमें वह पहलेहीसे मौजूद थीं। क्या इन सबसे आपका कुछ गुण प्रगट हुआ ? लोग विक्रमको याद करते हैं या उसके सिंहासनको, अक- बरको या उसके तखतको १ शाहजहांकी इज्जत उसके गुणांसे थी या तख्तेताऊससे ? आप जैसे बुद्धिमान पुरुषके लिये यह सब बात विचा- रनेकी हैं। चीज वह बनना चाहिये जिसका कुछ देर कयाम हो। माता पिता- की याद आते ही बालक शिवशम्भुका सुरवस्वप्न भंग होगया। दरबार समाप्त होते ही वह दरबार-भवन, वह एम्फीथियेटर तोड़कर रख देनेकी वस्तु हो गया। उधर बनाना, इधर उग्वाड़ना पड़ा। नुमायशी चीजों- का यही परिणाम है। उनका तितलियोंकासा जीवन होता है। माई- लार्ड ! आपने कछाड़के चायवाले साहबोंकी दावत खाकर कहा था कि यह लोग यहां नित्य हैं और हम लोग कुछ दिनके लिये। आपके वह “कुछ दिन” बीत गये। अवधि पूरी हो गई । अब यदि कुछ दिन और मिल तो वह किसी पुराने पुण्यके बलसे समझिये। उन्हींकी आशापर शिवशम्भु शर्मा यह चिट्ठा आपके नाम भेज रहा है, जिससे इन मांगे दिनोंमें तो एक बार आपको अपने कर्तब्यका खयाल हो। जिस पदपर आप आरूढ़ हुए, वह आपका मौरूसी नहीं-नदीनाव संयोगकी भांति है। आगे भी कुछ आशा नहीं कि इस बार छोड़नेके [ १८०