पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२०४

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(भारतमित्र १७ सितम्बर सन् १९०४ ई.) वसरायका कर्तव्य (३) भाई लार्ड ! आपने इस देशमें फिर पदार्पण किया, इससे यह भूमि कृतार्थ हुई। विद्वान बुद्धिमान और विचारशील पुरुपोंके चरण जिम भूमिपर पड़ते हैं, वह तीर्थ बन जाती है। आपमें उक्त तीन गुणोंके सिवा चौथा गुण राजशक्तिका है। अतः आपके श्रीचरण-स्पर्शसे भारतभूमि तीर्थसे भी कुछ बढ़ कर बन गई। आप गत मंगलवारको फिरसे भारतके राजसिंहासन पर मम्राटके प्रतिनिधि बनकर विराजमान हुए। भगवान आपका मङ्गल करे और इस पतित देशके मङ्गलकी इच्छा आपके हृदयमें उत्पन्न करे। बम्बईमें पांव रखते ही आपने अपने मनकी कुछ बात कह डाली हैं । यद्यपि बम्बईकी म्यूनिसिपलिटीने वह बात सुननेकी इच्छा अपने अभि- नन्दनपत्रमें प्रकाशित नहीं की थी, तथापि आपने बेपूछेही कह डालीं। ठीक उसी प्रकार बिना बुलाये यह दीन भङ्गड़ ब्राह्मण शिवशम्भु शर्मा तीसरी बार अपना चिट्ठा लेकर आपकी सेवामें उपस्थित है। इसे भी प्रजाका प्रतिनिधि होनेका दावा है। इमीसे यह राजप्रतिनिधिके सम्मुख प्रजाका कच्चाचिट्ठा सुनाने आया है। आप सुनिये न सुनिये, यह सुनाकरही जावेगा। ____ अवश्यही इस देशकी प्रजाने इस दीन ब्राह्मणको अपनी सभामें बुलाकर कभी अपने प्रतिनिधि होनेका टीका नहीं किया और न कोई पट्टा लिख दिया है। आप जैसे बाजाबता राजप्रतिनिधि हैं वैसा बाजाब्ता शिवशम्भु प्रजाका प्रतिनिधि नहीं है। आपको सम्राट्ने बुलाकर अपना वैसराय फिरसे बनाया। विलायती गजटमें खबर निकली। वही खबर तार द्वारा भारतमें पहुंची। मार्गमें जगह १८७ ।