पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२१६

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प्राशाका अन्त आपको नौशीरवां समझनेको मोहलत पाई थी या नहीं, ठीक नहीं कहा जासकता। क्योंकि श्रीमानने जल्द अपने कामोंसे ऐसे जल्दबाज लोगों- को कष्ट-कल्पना करनेके कष्टसे मुक्त कर दिया था। वह लोग थोड़ेही दिनोंमें इस बातके समझनेके योग्य होगये थे कि हमारा प्रधान शासक न विक्रमके रंग-ढङ्गका है, न हारू या अकबरके, उसका रंगही निराला है। किसीसे नहीं मिलता। ___ माई लार्ड ! इस देशकी दो चीजोंमें अजब तासीर है। एक यहाँके जलवायुकी और दूसरे यहाँके नमककी, जो उमी जलवायुसे उत्पन्न होता है। नीरससे नीरम शरीरमें यहाँका जलवायु नमकीनी ला देता है। मजा यह कि उसे उस नमकीनीकी खबर तक नहीं होती। एक फारिसका कवि कहता है कि हिन्दुस्थानमें एक हरी पत्ती तक बेनमक नहीं है, मानो यह देश नमकसे सींचा गया है। किन्तु शिवशम्भु शर्माका विचार इस कविसे भी कुछ आगे है। वह समझता है कि यह देश नमककी एक महाखानि है, इसमें जो पड़ गया, वही नमक बन गया। श्रीमान कभी चाहें तो सांभर-झीलके तटपर खड़े होकर देख सकते हैं, जो कुछ उसमें गिर जाता, वही नमक बन जाता है। यहाँ- के जलवायुसे अलग खड़े होकर कितनोंहीने बड़ी-बड़ी अटकलें लगाई और लम्बे चौड़े मनसूबे बाँध पर यहाँके जलवायुका असर होतेही वह सब काफूर हो गये। ___ अफसोस माई लार्ड ! यहाँक जलवायुकी तासीरने आपमें अपनी पिछली दशाके स्मरण रखनेकी शक्ति नहीं रहने दी। नहीं तो अपनी छः साल पहलेकी दशासे अबकी दशाका मिलान करके चकित होते। घबराके कहते कि ऐं ! मैं क्या हो गया ? क्या मैं वही हूं, जो विलायतसे भारतकी ओर चलनेसे पहले था ? बम्बईमें जहाजसे उतरकर भूमिपर पाँव रखतेही यहाँके जलवायुका प्रभाव आपपर आरम्भ होगया था। [ १९९ ]