पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२१८

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श्राशाका अन्त सहृदयताको भगाता है और उदारताको हजम कर जाता है। अन्तको आँखोंपर पट्टी बांधकर, कानोंमें ठीठे ठोककर, नाकमें नकेल डालकर, आदमीकों जिधर तिधर घसीटे फिरता है और उसके मुँहसे खुल्लम खुल्ला इस देशकी निन्दा कराता है। आदमीके मनमें वह यही जमा देता है कि जहाँका खाना वहाँकी ग्खूब निन्दा करना और अपनी शेखी मारते जाना। हम लोग भी उस नमककी तासीरसे बेअसर नहीं हैं। पर हमारी हड़ियां उसीसे बनी हैं, इस कारण हमें इतना ज्ञान रहता है कि हमारे देशके नमककी क्या तासीर है। हमलोग खूब जानते थे कि यदि श्रीमान कहीं दूसरी बार भारतमें आगये तो एक दम नमककी खानिमें जाकर नमक हो जावंगे। इसीसे चाहते थे कि दोबारा आप न आवे । पर हमारी पेश न गई। आप आये और आतेही उस नमककी तासीर- का फल अपने कौंसिल और कानवोकेशनमें प्रगट कर डाला ! इतने दिन आप सरकारी भेदोंके जाननेसे, अच्छे पद पानेसे, उन्नति- की बात सोचनेसे, सुगमतासे शिक्षा लाभ करनेसे, अपने स्वत्वोंके लिये पालीमेण्ट आदिमें पुकारनेसे, इस देशके लोगोंको रोकते रहे। आपकी शक्तिमें जो कुछ था, वह करते रहे। पर उसपर भी सन्तोष न हुआ, भगवानकी शक्तिपर भी हाथ चलाने लगे ! जो सत्यप्रियता इस देशको सृष्टिके आदिसे मिली है, जिस देशका ईश्वर “सत्यंज्ञानमनन्तमब्रह्म" है, वहाँके लोगोंको सभामें बुलाके ज्ञानी और विद्वानका चोला पहनकर उनके मुँहपर मठा और मक्कार कहने लगे। विचारिये तो यह कैसे अधःपतनकी बात है ? जिस स्वदेशको श्रीमानने आदर्श सत्यका देश और वहांके लोगोंको सत्यवादी कहा है, उसका आला नमूना क्या श्रीमान ही हैं ? यदि सचमुच विलायत वैसाही देश हो, जैसा आप फरमाते हैं और भारत भी आपके कथनानुसार मिथ्यावादी और धूर्त देश हो, तोभी तो क्या कोई इस प्रकार कहता है ? गिरेके ठोकर मारना क्या सज्जन और [ २०१ ]