पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२४४

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लार्ड मिन्टोका स्वागत एक विनय और भी साथ साथ की जाती है कि इस देशमें श्रीमान जो चाहें बेखटके कर सकते हैं, किसी बातके लिये विचारने या सोचमें जानेकी जरूरत नहीं । प्रशंसा करनेवाले अब और चलते समय बराबर आपको घेरे रहेंगे। आप देखही रहे हैं कि कैसे सुन्दर कासकेटोंमें रखकर, लम्बी चौड़ी प्रशंसा भरे पड़ेस लेकर लोग आपकी सेवामें उपस्थित होते हैं। श्रीमान उन्हें बुलाते भी नहीं, किसी प्रकारकी आशा भी नहीं दिलाते, पर वह आते हैं। इसी प्रकार हुजूर जब इस देशको छोड़ जायगे तो हुजूरबालाको बहुतसे एड़े म उन लोगोंसे मिलंगे, जिनका हुजूरने कभी कुछ भला नहीं किया। बहुत लोग हुजूरकी एक मूर्तिके लिये खनाखन रुपये गिन दंगे, जैसे कि हुजूरके पूर्ववर्ती वाइसरायकी मूर्ति के लिये गिने जा रहे हैं। प्रजा उस शासककी कड़ाईके लिये लाख रोती है, पर इसी देशके धनसे उसकी मूर्ति बनती है। विनय हो चुकी, अब भगवानसे प्रार्थना है कि श्रीमानका प्रताप बढ़े यश बढ़ और जबतक यहां रहें, आनन्दसे रहें। यहाँकी प्रजाके लिये जैसा उचित समझ करें। यद्यपि इम देशके लोगोंकी प्रार्थना कुछ प्रार्थना नहीं है, पर प्रार्थनाकी रीति है, इससे की जाती है । ( भारतमित्र, २२ गितम्बर सन १९०, ई० ) [ २२७ ।