पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२८९

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास उसकी नींव उर्दू अखबार नवीसी के मध्य समयमें पड़ी है । उर्दू के पञ्च अखबारोंमें वही पहला अखबार है और वही अब जीवित है। "अवध अखबार" इसके जारी होनेसे १८ साल पहले जारी हो चुका था। पंजाबमें उस समय कितने ही अखबार जारी हो चुके थे। लखनऊमें भी और कई उद्देके अग्वबार जारी थे। किन्तु दिल्लगी- बाज अखबार उस समय तक कोई न था। उसने जारी होकर पहले पहल उर्दू भाषाको हास्यरससे प्लावित किया। निकलनेके दो ही तीन साल बाद उसकी बहुत धूम पड़ गई थी और उसकी इजत होने लगी थी। उसका मूल्य भी कम न था। सवसाधारणसे डाक महसूलके सहित १२||-) लिया जाता था और अमीरोंसे तो और भी अधिक लिया जाता था। उर्दू के एक माताहिक पत्रका इतना मूल्य बहुत अधिक था, पर तो भी इसके ग्राहकोंको संख्या एकवार दो हजारके आसपास जा पहुंची थी ; यह कुछ कम आदरकी बात नहीं है। ___ अवधपञ्चके लेख और चुटकले उट्टके प्रायः सब अखबारोंमें नकल होते थे। गम्भीर अखबारोंका भी उसको देखादेखी हास्यकी ओर ध्यान हुआ था। उसकी नकल पर कितने ही पंच निकले भी। लखनऊ हीसे एक “इण्डियन पञ्च" निकला और कुछ दिन अच्छे ढङ्ग पर चला चला था। दिल्लीसे "देहलोपञ्च' निकला था और फिर लाहोरमें जाकर कई वप चलकर बन्द हुआ। और भी दस पांच पञ्चोंके नाम इधर उधरसे सुननेमें आते थे, जिनमेंसे एक बांकीपुरमें, जो अबतक जीवित है। पर वह सब अवधपञ्चके सामने इज्जत न पासके और अन्तको ठहर भी न सके। लाहोरसे “मुल्ला-दोप्याजा” निकला था। वह खासा था, पर जल्द चल बसा। लखनऊमें बूढ़ अवध अखबारको भी अवध पञ्चकी देखादेखी दिल्लगी सूझी थी। उसमें भी पञ्चाना लेख लिखे जाने लगे थे। पण्डित रत्ननाथने 'फिसानये आजाद' उसी [ २७२ ]