पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२९८

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उर्द-अखबार नहीं हुई। यद्यपि आज उसकी भाषा दस वर्ष पहलेकी भाषासे बहुत उन्नतिपर है, तथापि अब भी वह साफ नहीं है। विशेषकर जहां अगरेजी- से तरजमा होता है वहाँ उसकी भाषाका कभी-कभी मतलब ममझमें नहीं आता। पहले ऐसा अधिक होता था, अब कम होता है। इसका कारण यह भी होसकता है कि अगरेजी अखवारोंके तरजमोंसे हिन्दु- म्तानीको अधिक काम लेना पड़ता है। और उदृ अच्छी तरह सीग्वनेका सम्पादकको मौका नहीं मिला। अथवा अच्छे लेखोंकी जरूरतके मामने भापा अच्छी करनेकी परवा नहीं की गई, जिसका एक सबूत हिन्दुन्तानी- के प्रसके नामहीसे मिलता है। उक्त प्रसका नाम “जी० पी० वर्मा ब्रादरान प्रेस" है। इस नामके अर्थकी बात जाने दीजिये, बहुत लोग आज तक इसे ठीक-ठीक पढ़ भी नहीं सकते हैं। . राजनीतिकी चर्चा हिन्दुस्तानीने खूब की और करता है। कांग्रसकी रिपोर्टका उर्दू तरजमा वह बराबर छापता रहा। एक साल हिन्दी तर- जमा भी छापा था। पर इन सब गुणोंपर भी उसमें एक दोप ऐमा है, कि उससे उसका काम अधूरा है और रहेगा। इस देशकी धर्मनीति और समाजनीतिमें वह बड़े कच्च पथपर चलता है। जिस जातिका सुधार करना है, उसकी आंग्वोंमें आदर पाये बिना कोई सुधारक सफल मनोरथ नहीं हो सकता। हिन्दुस्तानीमें भारतके धर्म और समाजको जिस ढङ्गसे आलोचना होती है, उससे ठीक यही जान पड़ता है कि उसका सम्पादक हिन्दुओंसे कुछ सहानुभूति नहीं रखता और हिन्दुओंके धर्म और समाजके विषयमें उसका उतना ही ज्ञान है, जितना भारतमें बैठे हुए किसी युरोपियनका। ___ उदाहरणकी भांति मिष्टर गोखलेकी बात कही जाती है। उनका नाम गोपाल कृष्ण गोखले है। उच्चवंशके दक्षिणी ब्राह्मण हैं। अच्छी शिक्षा पाई है। बड़ लाटकी कौंसिलमें उन्होंने इतनी योग्यता देखाई कि हिन्दु- [ २८१ ।