पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३०२

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उर्दू-अखबार सन् १८८६ ई० में “कोहेनूर” से सम्बन्ध रहनेके समय “पैसा अखबार के मालिक एक बार लाहोरमें मिले थे। वह अपने पत्रको चलानेकी बहुत चेष्टामें थे, पर चलता न था। तीन चार साल तक उनको खूब हैरान होना पड़ा, पर उन्होंने हिम्मत न छोड़ी। इतनेमें “पैसा अग्वबार" को अपने चमकने और आदर पानेक लिये एक मौका मिल गया। एक तो उन दिनों लाहोरके कई एक पुराने अग्वबारोंके दिन पूरे होगये । दूसरे "अखबारे आम” जो सस्ता था, सप्ताहमें कईबार और अन्तको दैनिक होकर महंगा हो गया । यद्यपि उसका एक साप्ताहिक पत्र भी दो रुपये सालका निकलने लगा, परन्तु दो रुपये सालके पंसा अखबार में कुछ अच्छा मसाला होता था। इससे पंसा-अखबारहोकी बढ़ती हुई। धीरे धीरे वह इस योग्य होगया कि गूजरानवालासे लाहोरमें चला आया। यहां आकर उसकी खूब उन्नति हुई। अब वह सामाहिक सिवा कई महीनेसे दैनिक भी निकलने लगा है। दो तीन मासिकपत्र भी उसके यहाँसे निकलते हैं। उसका मूल्य जब दो रुपये साल था, तब उसका नाम पंसा-अखबार" था। अब उसके दैनिकका मूल्य पन्द्रह रुपये माल हो जाने पर भी नाम वही है। वह नाम इतना पक्का हो गया कि उसके अर्थको ओर भी किसोका ध्यान नहीं । पसा-अखबारने कई एक नई बात उद दुनियांमे पदाकर दिखाई हैं। एक यह कि मूल्य बहुत कम होनेपर भी अखबारकी आमदनीसे अखबार चला दिया। काहेनूर चलता था, पर अग्ववारकी आमदनीसे नहीं। और अखबार चलते थे, पर उनकी आमदनी उनको काफी नहीं होती थी। अब भी कितनेही अग्वबार लटम-पष्टम चलते हैं। पर पैसा- अखबार खासे तिजारती ढङ्गपर चलता है। उसने विज्ञापनोंसे खासा लाभ उठाया है। इतना लाभ विज्ञापनोंसे दूसरे उर्दू अखबारने शायद ही उठाया हो। आमदनीकी कमो और दूसरे कारणोंसे कुछ उर्दू अख- । २८५ ।