पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३०८

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उर्दू-अखबार और कमही ठहर सके। इसके बाद कविताके पत्रोंका नम्बर लगा। उर्दूकी कवितामें बड़ा जोर गजलोंका होता है। वही गजलं उन मासिक पत्रोंमें छपने लगीं। दिल्लीमें जबतक बादशाही और लावनऊमें नवाबी रही, तबतक उद- के कवि मुशाइरेकी गजल लिग्वा करते थे। मुशाइर अमीरों और नवाबोंके मकानपर हुआ करते थे। एक समस्या दी जाती थी, जिसे उद्देमें “तरहका मिसरा” कहते हैं। उमीपर मब शाइर अपनी-अपनी गजल बनाकर लाते थे और नियत दिन पर मुशाइरमें सुनाते। अब वह रोति लगभग उठमी गई है। इमीसे इन गजलोंके मासिक पत्रोंने उसे एक बार फिर चमकाया। हर महीने यह एक नई समस्या छाप देते थे और उमी पर सब कवि गजल लिग्व-लिग्वकर भेज देते थे। वही कट छटकर इनमें छप जाती थी। कोई २० मालसे अधिक हुए मा एक मासिकपत्र कलकत्तसे निकलता था जिसका नाम "गुलस्तये नतीजये मुखुन" था। इसकी देखादेखी आगरस “गुलदस्तयेसुखन" निकला। फिर और कई निकले । यहाँ तक कि इस प्रकारक मामिकपत्रोंको लोग गुलदस्ता कहने लगे। ___ इन गुलदस्तोंकी महक लखनऊमें पहुंची। वह गजलोंका घर था। जरा भूलाही था कि इन गुलदस्तों ने फिर उसे गजलों की याद दिला दी। जैसे मस्त शराबियोंके मामने कोई एक तान उड़ा दे और फिर वह सब गाने लग पड़, उसी प्रकार लखनऊसे गुलदस्ते निकलने लगे और फिर एक बार गजलोंका दौर शुरू हुआ। लखनऊसे मियां निसारहुसैनने “पयामेयार" नामका एक गुलदस्ता निकाला, जो पहले पहले हिन्दुस्तानी प्रसमें छपता था। दो तीन साल तक उसकी बड़ी नामवरी हुई। उसकी नकल पर लखनऊहीसे कई अच्छे अच्छे गुलदस्ते निकले । जिनमेंसे "तोहफये उशशाक" अच्छा था जो [ २९१ ]