पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३१७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास इसकी भाषाकी प्रशसा करते हैं। बहुतसे पुराने और नये मुसलमान सुलेखक इसमें लिखते हैं और बहुत इसकी प्रशंसा करते है। यह बात बहुत दिनों पीछे एक हिन्दू सम्पादक द्वारा सम्पादित मासिकपत्रको नसीब हुई है। "जमाना" की जुलाई और अगस्तकी संख्या १४० पृष्ठ हैं । अर्थात एक संख्या ७० पृष्ठकी हुई। इमसे मोटाईमें वह मखजनसे भी कुछ भारी हो जाता है। इसके सिवा उसकी लिखाई भी कुछ गहरी है। इससे उसमें विपय कुछ अधिक आते हैं । कई महीनेसे एक-एक तसवीर भी उममें निकलने लगी है । जो संख्या हमारे सामने है, उनमें गद्य और पद्य मिलाकर १४ प्रबन्ध हैं, जिनमेंसे कई एक पढ़नेके योग्य हुए हैं। इसके सम्पादककी उमर यद्यपि कम है, पर वह बुद्धिमें वृद्ध हैं, इम वातक कहनेमें अत्युक्ति न होगी। क्योंकि कितनेही बूढ़े सुलंग्वक जो वीस- वीस मालसे लिखना छोड़ बैठे थे, इस कागजमें लिखने लगे हैं। यह इसके सुयोग्य सम्पादकको चेष्टाहोका फल है। ग्बानबहादुर सय्यद अकबर हुसैन पश्नर जज किसी ममयमें अवधपश्चमें लिखा करते थे । देखते हैं कि वह अब इसमें लिखते हैं । शमसुलउल्मा मौलवी जकाउल्लाह माहब बहुत बूढ़ लखक हैं, उनका भी एकाध प्रबन्ध इसमें दिखाई देता है। भिन्न-भिन्न जाति और धर्मके प्रसिद्ध लंग्वक जितने इसे मिले हैं, आजतक उट्ट में और किसी मासिक पत्रकों नहीं मिले ! मखजनसे पहले लगभग मव उर्दू मामिकपत्र मुसलमानोंसे प्रबन्ध लिखवाते थे । मखजनने हिन्दू-मुसलमान दोनोंका ध्यान इधर खंचना चाहा, पर उसे पूरी सफलता नहीं हुई । उसका कारण पिछले लेखमें कहा जाचुका है। हां “जमाना” ने कई एक महीनेहीमें वह बात हासिल की है। उसे हिन्दु मुसलमान दोनों तरहके नामी-नामी साहित्यसेवी मिल हैं। कितनेही प्रसिद्ध ग्रन्थकार और कितनेही नामी समाचारपत्रोंके सम्पादक [ ३०० ]