पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३१८

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उर्दू-अखबार उसमें लिखते हैं। सम्पादकोंको अपने पत्रोंहीसे फुरसत नहीं रहती। उनसे लिम्बवाना जमानेकी बहादुरी है। एक इम पत्रका विशेष गुण यह है कि मामयिक विषयोंकी भी ग्वब आलोचना करता है। शायद उदृ के सब मासिकपत्रोंमेंसे यह गुण अकेल इसो पत्रमें हैं। यह सब प्रकार और प्रत्येक विचारके लोगोंको मिलाना चाहता है। सामयिक साहित्यकी आलोचना भी इसमें ग्यूब होती है। इसके हर नम्बरमें दो-चार ध्यानसे पढ़नेके योग्य लेख होते हैं। पांच-सात लंग्व इसके पिछल नम्बरों में बहुत धूमके निकले हैं। उनमेंसे पं० ब्रजनारायण चकबम्तकी लिखी स्वगीय पण्डित रत्ननाथकी जोवनी और मुंशी सूर्यनारायण मेहरकी लिखी “कुंजे तनहाई” नामकी कविता प्रशंसाके योग्य लेख थे । जिस ढंगसे यह मासिकपत्र चल रहा है, यदि दो-चार साल इसी प्रकार उन्नति करना जाय तो एक बहुत बड़ा नामी पत्र होगा,-- इसमें कुछ मन्देह नहीं । ___ अब दो-चार बात जमानाकी पालिसीक विषयमें कही जाती हैं। उमको वही पालिमी है, जो नवशिक्षित हिन्दुओंकी आजकल है । इससे उसकी आलोचना करना एक प्रकार नवशिक्षित हिन्दुओंकी रायकी आलोचना करना है। उसके मम्पादक थोड दिनसे बी. ए. पास हुए हैं । कालिजसे निकल हुए विद्यार्थियोंकी जो राय होती है, वही उनकी राय है। पुराने हिन्दू समाजमें उनके पमन्दके लायक बहुत बात नहीं हैं । विद्यार्थीपनको छोड़कर उन्होंने संसारका कुछ भी अनुभव प्राप्त नहीं किया है। तथापि उनको माग वही पसन्द है, जिसपर उन्होंने छात्रावस्थामें कालिजके अन्दर बैठकर अटकल लगाई है। इसी जुलाई और अगम्तकी संख्या में एक प्रबन्ध पण्डित ब्रजनारायण चकवस्त लखनवीका निकला है । वह अंगरेजी पढ़े हिन्दुओंकी रायका दर्पण है । प्रबन्ध कहता है कि जिन लोगोंमें खाने-पीनेकी छूत-छात कुछ नहीं [ ३०१ ]