पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३२६

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उर्दू-अखबार "नय्यरे आजम” दो नाम लेनेके योग्य हैं। “रहबर” पंडित प्रतापकृष्णके समयमें अच्छा कागज था, अब भी खासा है। “नय्यरे आजम' २६ सालका पुराना है। पर दुःश्वकी बात है कि उसकी कुछ उन्नति नहीं हुई और बात भी यह है कि जिस चालसे मुरादाबादी उर्दू अग्ववार चलते हैं, इससे उनकी उन्नति हो भी नहीं सकती। उनमेंसे कई एकको निन्दा- कुत्साके अभियोगमें जेल जाना पड़ा है, कई एक अब भी उमी चाल चले जाते हैं । तथापि कुछ सुधार हुआ है, कुछ उनके आंख हुई हैं। नय्यरे आजमने हमारा उद अखवारोंके सम्बन्धका लेख पढ़के कहा है कि लेख जरूरी और कामका है, पर उसमें जो उर्दू अग्वबारोंकी प्रशंसा की गई है, वह भी प्रशंसाकी ओटमें निन्दा ही है, पर अमल बात यह है कि हमने न स्तुति की है न निन्दा। उर्दू पत्रोंको उनकी जैसी अवस्था है, वह खोल कर समझा दी है। इसलिये कि उनका सुधार हो और वह अपने लिये अच्छा मार्ग तलाश कर। अपने बहुतसे गुण दोष मनुष्य बहुत समझदार होने पर भी स्वयं नहीं समझता । समालोचककी लेवनीसे जब गुण दोप प्रगट होते हैं, तबही वह उसकी ममझमें आते हैं। आगे उसे अधिकार है कि चाहे वह उनको सुनकर नाराज हो या समझ कर लाभ उठाये। मथुरासे पंडित दीनदयालु शम्माने सन १८८५ ई० में “मथुरा अखबार" निकाला था, जो एक सालसे कुछ कम चला। पत्र बड़े आकारका था । इसमें सबसे पहले ईश्वरकी एक स्तुति हिन्दीमें और उसकी नकल उर्दू में होती थी। पीछे राजनीति, सामाजिक और धर्म सम्बन्धी लेख होते थे। पत्र राजनीति सम्वन्धी था, पर हिन्दू-धर्मका भाव उसमें खूब था। इस ढङ्गका वह एकही पत्र था। इससे पहले पंडितजीने अपने स्थान झझरसे “रिफाहेआम" नामका एक मासिक पत्र निकाला था। वहभी साल दो साल चला था। [ ३०९ !