पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३५४

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हिन्दी-अखबार उद्देश्योंको लेकर भारतमित्रने काम आरम्भ किया। पहले पहल इसका मूल्य सालाना ॥) और डाक महसूल भी था। उस समय अखबारोंका महसूल दो पैसे था। १० वी संख्यासे “भारतमित्र" साप्ताहिक हो गया। हर वृहस्पतिको निकलने लगा । मूल्य डाक व्यय सहित ३) नियत हुआ। २२ नम्बर उसी आकारमें छपे। २३ वां नम्बर डिमाई एक शीटके दो पन्नों पर निकला । पहले वप २६ दिसम्बर तक उसके २४ नम्बर निकले। दूसरा वर्ष जनवरी सन् १८७६ ई० से आरम्भ हुआ। तबसे बराबर जनवरीके आरम्भमें उसका वर्प बदलता है। ८ मई सन १८७६ ईस्वीसे "भारतमित्र” अपने घरके छापेखानेमें छपने लगा और आकार दूना हो गया-अर्थात् डबल डिमाईके चार पन्नों पर छपने लगा। उस समय कलकत्तमें न कोई हिन्दीका प्रस था, न अखबार। बङ्गाली छापेखाने में कुछ-कुछ हिन्दीका काम होता था; वहीं हिन्दुस्थानियोंको दौड़ना पड़ता था। बङ्ग-भापाके लम्बे चौड़े और नामी पत्र उस समय भविष्यके गर्भमें थे । “सोमप्रकाश” और “सहचर" उस समय नामी बङ्गला पत्र थे। उनमें से पहला गुमनाम दशामें जीता है और दूसरा कई सालसे बन्द है। ३ जुलाई सन १८७६ ईस्वीसे भारतमित्रका आकार और बढ़कर रायल दो शीटके चार पन्ने हो गया। कागज भी अच्छा हो गया। दो-तीन सालके भीतर ही उसकी लेख प्रणाली सुधर गई। उसे विज्ञापन बहुत मिलने लगे और वह अच्छे समाचारपत्रकी गिनतीमें हो गया। विज्ञापन उसे इतने मिलने लगे थे कि एक सज्जनने चिढ़कर कहा-इसका नाम इश्तिहारपत्र होना चाहिये । वास्तवमें किसी हिन्दीपत्रको तब तक इतने विज्ञापन न मिले थे । २५ अक्टूबर सन् १८८३ ईस्वीसे इसके सम्पादक पं० हरमुकुन्द शास्त्री हुए। उन्होंने कई साल तक इसे अच्छी रीतिसे चलाया । राजनीतिकी [ ३३७ ]