पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३५७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास अंगरेजी-पत्रांसे आसानीके साथ खबर और लेख नकल कर सकते हैं। तारकी खवर अंगरेजीकी अंगरेजीमें छाप सकते हैं। अंगरेजीवाले लोग भी आसानीसे मिल सकते है, पर हिन्दीमें तो अंधेर हो जाता है । बम्बई कांग्रेसके प्रेसिडेण्ट काटन साहबकी स्पीच छापते हुए अंगरेजी अखबारोंके सम्पादकोंको इतना ही कष्ट हुआ कि उन्होंने एक छपा हुआ कागज अपने कम्पोजिटरोंके हाथमें दे दिया और उसे कम्पोज करके फक दिया। पर भारतमित्रमें उसका हिन्दी तरजमा तब छप सका, जब दो योग्य पुरुषोंने छः-छः घण्टे नित्य बैठकर तीन दिन तक उसका अनुवाद किया। वैसा ही कष्ट और दूसरी स्पीचों के छापनेमें होता है ; फिर भी एक सन्देह बना रहता है कि अनुवाद-कर्ता कहीं कुछ भूल तो नहीं गया। ___ सारांश यह है, अभी हिन्दी अखबारके दैनिक होनेका समय नहीं आया है। दैनिक पत्र पढ़नेवालोंके लिये हिन्दी दैनिकोंमें जब तक ऐसा मसाला न होगा, जो अंगरेजी दैनिकोंमें न मिले, तब तक हिन्दी दैनिकों- को कौन पढ़ेगा ? क्योंकि हिन्दी दैनिकोंको भी अधिक वही लोग पढ़ेंगे, जो अंगरेजी दैनिक पत्रोंको पढ़ते हैं। अभी हिन्दीका इतना प्रचार भी नहीं हुआ है कि दैनिक हिन्दी-पत्रोंको बहुत ग्राहक मिल सके। और साथ ही हिन्दी दैनिक-पत्र अभी तक उत्तम प्रबन्धसे चलाये भी नहीं गये हैं। ग्बर, भारतमित्र हताश नहीं हुआ है। वह उस समयकी प्रतीक्षा कर रहा है कि दैनिक हिन्दी पत्र भी चल सकेंगे और चलना एक दिन कठिन नहीं रहेगा। क्योंकि गुजराती भाषामें कई उत्तम-उत्तम दैनिक पत्र बम्बईसे निकलते हैं और यह डीलडौलमें, लिखा-पढ़ीमें ठीक अंगरेजी दैनिकोंके मुकाबलेके हैं। हिन्दी बोलनेवालों- की संख्या ६ करोड़के लगभग और गुजराती बोलनेवालोंकी केवल एक करोड़। पर फर्क यही है कि गुजराती बोलनेवालोंमें पढ़े-लिखे लोगोंकी [ ३४० ]