पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३५८

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हिन्दी-अखबार संख्या अधिक है और सबसे अधिक शिक्षित पारसी लोग उन्हींमें हैं। हिन्दी बोलनेवाले शिक्षामें सबसे पीछे हैं। जब हिन्दीवालोंमें भी पढ़े- लिखे लोगोंकी संख्या बढ़ेगी, तो हिन्दी अखबारोंकी अवश्य उन्नति होगी। हिन्दीके लिये उन्नति करनेको बड़ा मैदान पड़ा है। ___ जनवरी सन १८६६ ई०से भारतमित्रका आकार और भी बढ़ गया। उसका वर्तमान आकार उस समयसे हुआ। तबसे इसका मूल्य और कम करके केवल दो रुपये साल कर दिया गया है । यद्यपि भारतमित्रका जन्म हिन्दी अखबारोंके दूसरे दौर में हुआ, पर अब वह तीसरे दौरका अख- बार है । क्योंकि उसका वर्तमान सम्पादक जो इस लेग्बका भी लेवक है, तीसरे दौरका आदमी है। तीसरे दौरके अखबार लिखनेवालोंके लिये कई एक ऐसी आसानियां हैं जो पहले और दूसरे दौर में न थीं। अर्थात इस समयके हिन्दी अखबारोंके पढ़नेवाले कई-कई हजार हो गये हैं। दो ही चार वपमें यह संख्या दस हजारसे ऊपर पहुंच जावेगी और हिन्दीमें अच्छे दैनिक पत्र निकलनेका समय आ जावेगा। पर बहुत भारी परिश्रमसे ऐसा होगा। भारतमित्रके सम्बन्धकी बहुत-सी जाननेके योग्य बात गत २ जनवरी सन १६०४ ई०के अङ्कमें निकल चुकी हैं। इस लेखमें जो कुछ कहा गया है, वह हिन्दी अग्वबारोंके लेखका सिलसिला कायम रखनके लिये लिखा गया है। दूसरोंकी आलोचना हो सकती है, पर अपनो आलोचना स्वयं करना कठिन है। इससे भारतमित्रकी आलोचना दूसरे सज्जनों पर छोड़ी जाती है। यहां केवल उसके चलाने- वालोंका उद्देश्य बता कर लेख समाप्त किया जाता है। इसके आदि नेता कलकत्ता बड़ाबाजारके सारस्वत और खत्री हैं। जो इस कागजको केवल इसलिये निकालते थे कि हिन्दी भाषामें भी एक अच्छा समाचार पत्र रहे। वह लोग सब व्यापारी थे। इसके वर्तमान मालिक [ ३४१ ]