पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३६६

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हिन्दी-अखबार वर्षा ऋतुमें इनमें थोड़ा-थोड़ा जल बहता रहता है और जल सूख जानेके बाद उनमें जंगली झाड़ियां और छोटे-छोटे पेड़ खूब फैल जाते हैं। ___ गांवमें सब घर कञ्च मट्टीके हैं । खपरैलोंसे छाये हुए हैं। पक्की एक श्रीमान राजा रामपालसिंह महोदयकी बारहदरी है। हिन्दोस्थान प्रेसका भी कुछ अंश पक्का है, जो गाँवके दक्षिणी द्वारके सहारे बना हुआ है। इसी प्रकार पुरानी गढ़ीका कुछ अंश पक्का है, जिसे वहाँका राजभवन या किला कह सकते हैं। इन दो तीन मकानोंके सिवा सब मकान कच्च हैं। वर्षा ऋतु और शीतकालमें कालाकांकरका रहना बहुत ही भला जान पड़ता है । जेठकी धूपके समय अवश्य वहाँ दिनमें जी घबराता है और आंधी चलनेसे रेत उड-उड़कर मजा किरकिरा करता रहता है। फिर जब तेज आंधियां चलती हैं, तो खपरैल हिल हिलकर बहुतसे मकानोंके भीतर भी रेत गिरने लगता है। तो भी गर्मीकी रात अच्छी होती हैं और सवेरे उठकर बनको हवा और गंगाजीका स्नान तो उन दिनों बड़ा सुखकारी होता है। कालेकांकरका जलवायु बड़ाही स्वास्थ्यप्रद है। अन्न वहां इतना पचता है कि ड्योढ़ी दूनी खुराक हो जाती है। चीज सब अच्छी और सस्ती मिलती हैं । अन्न अच्छा मिलता है। घी शुद्ध साफ मिलता है। दूध अच्छा मिलता है। एक आनेका एक सेर दूध हमारे जमानेमें मिलता था। उस समय वहाँ ४५ सेरका एक मन था। इससे दूध सेरकी जगह कोई सवा सेर मिलता था । बाजारके दिन कई प्रकारके शाक-पात आते थे, जो सस्तेही मिलते थे। आमोंका तो उक्त स्थान जङ्गल है। उसके आसपासके गांवोंमें कोसों तक आमोंके बाग हैं। सन १८६० ई० में इतने आम हुए थे कि दो पैसे सेकड़े तक बिकते थे। आमांकी गिनती भी वहाँ विचित्र देखनेमें आई थी,सौकी जगह एकसौ सताईस गिने जाते