पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३७५

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास शीट रायलके दो पन्नोंपर छपता है। मूल्य वार्षिक १०) है। दूरसे देखनेमें “हिन्दोस्थान” ही के समान मालूम होता है। जब यह दैनिक हुआ, तो ऐसी बेसामानीके साथ कि देखकर दुःख होता था। उसका टाइप इतना खराब हो गया था कि महीनों तक वह कुछ पढ़ा ही नहीं जाता था। खैर, पीछे टाइप बदल गया। पर अब भी उसकी छपाई आदिकी दशा निश्चित नहीं है। दैनिक होनेके बादसे उसके लेखोंका टङ्ग कुछ बदल गया है। पहलेको अपेक्षा कुछ स्वाधीनता उसमें आ गई है। रजवाड़ोंके मामलेमें किसी-किसी बातपर कभी-कभी वह कुछ बोलने भी लगा है। पर अभी पुराना भय छूटा नहीं है और जब तक छूटेगा नहीं, तब तक ठीक सफ- लता भी नहीं होगी। कागज छोटा है। लेाबोंका ढङ्ग उसमें छोटे कागजोंका-सा होना चाहिये। अंगरेजी दैनिकोंकी भांति किसी लग्वपर पांच-पाँच सात-सात हेडिङ्ग जड़ देना किमी छोटे आकारके दैनिक पत्र- का काम नहीं हैं। उसे अपने एक-एक लाइनके स्थानको बहुमूल्य समझना चाहिये। अंगरेजी दैनिकोंका आकार ग्खूब बड़ा होता है और टाइप छोटे-छोटे। वह किसी लखपर कई-कई हेडिङ्ग विठावं, तो बिठा सकते हैं। छोटे आकारके हिन्दी कागजको उनकी नकलकी क्या दरकार है ? ___ कई सालसे राजस्थान समाचारकी कई बात बदल गई हैं। एक तो उमक धर्म-विश्वासमें परिवर्तन हुआ है। अब उक्त पत्र कोई दो सालसे आर्य-समाजी नहीं जाहिर करता, वरञ्च पुरानी चालका हिन्दू बतानेकी चेष्टा करता है। आर्य-समाजियोंकी तरफदारीक लेख भी उसमें नहीं निकलते, वरञ्ज कभी-कभी पुरानी हिन्दू-धमकी तरफदारीकी एक-दो बात उसमें निकल जाती हैं। उसका यह परिवत्तन भारत धर्म महा- मण्डलक परिवर्तनके साथ हुआ है। बाबा ज्ञानानन्दने समथदानजीको