पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३८८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


हिन्दी-अखबार जाय। पर सज्जनकीर्ति-सुधारकर वैसा करना नहीं चाहता। न-जाने इसमें क्या उत्तमता समझी जाती है। लखनऊके अवध अखबारको इसी प्रकारके इशारे लिखनेकी आदत है। यदि वह कोई लेख पायो- नियरसे तरजमा करता है, तो उसके अन्तमें फारसीकी 'पे' बनाकर उसके साथ उस अङ्ककी तारीख लिख देता है। आश्चर्य नहीं, जो सजनकीर्ति-सुधाकरने उसी पत्रसे यह चाल सीखी हो। कुछ हो, यह चाल अच्छी नहीं और जिस हैसियतसे चलता है, उससे चलना अच्छा नहीं। उक्त पत्रकी धन-सम्बन्धी दशा बहुत अच्छी है। वह एक रितासतका अखबार है, इससे उसे धनकी कमी नहीं। कोई बारह- तेरह साल हुए हमको उदयपुर जानेका अवसर मिला था। उस समय हमने सजन-यन्त्रालयको देखा था। उसकी बहुत उत्तम दशा है, उसमें सब सामान सुन्दर और प्रचुर हैं, उस समय महाशय चालक- दानजी उसके प्रबन्धकर्ता थे। वह योग्य पुरुष थे। लिखने-पढनेकी उनमें खासी योग्यता थी। वह अखबार में कुछ विशेष लेख नहीं लिखते थे, पर कभी-कभी पुस्तकोंको आलोचना लिखते थे और जब कभी उदयपुरमें किसी अच्छे व्याख्याताके व्याख्यान होते थे तो उनका वर्णन आदि भी लिखते थे। वह सब अच्छा होता था। हम समझते हैं कि रियासतकी ओरसे उनको लिखनेकी स्वाधीनता न होगी, नहीं तो वह अवश्य कुछ लिखते। आजकल प्रवन्धकर्ताओंमें उनका नाम नहीं देखते हैं, मुंशी नजीर हुसैनका नाम छपता है। सज्जन यन्त्रालयके लिये रियासतका बहुत रुपया खर्च हुआ है और हजारों हरसाल खर्च होता है। इतना रुपया खर्च खरके एक ऐसा रद्दी कागज निकाला जाता है कि जो रियासतकी सीमासे बाहर जानेके लायक नहीं। इसका क्या कारण ? यदि रियासतोंमें राजनीतिक लेखोंके लिखनेकी स्वाधीनता नहीं है तो मत हो और बहुत लेख [ ३७१ ]