पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३९८

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हिन्दी-अखबार अब जनवरी सन १६०५ ई० से उसमें एक नया फेर बदल हुआ है। गवालियर गजटकी जगह उक्त पत्रका नाम “गवालियर ष्टेट गजट' होकर वह रियासतका सरकारी अखबार बन गया है। अब उसमें सरकारी आज्ञाएं, सरकारी विज्ञापन, गवालियरराज्यकी वर्षाका नकशा और बाजारदर, कभी कभी जी० आई० पी० रेलवेके विज्ञापन, मालके महसूलकी दर आदि विपय छपते हैं। साधारण समाचार अब उक्त गजटमें नहीं छपते । साधारण समाचारोंके लिये “जयाजीप्रताप” नामसे एक अलग हिन्दी साप्ताहिकपत्र निकलने लगा है। अब हिन्दी समाचार पत्रोंको गवालियार गजटकी जगह बदलेमें यही पत्र मिलता है, गवा- लियार गजट नहीं। इस पत्रमें अधिक खबर दूसरे पत्रोंसे नकल होती हैं और उन पत्रोंके नाम इशारेमें दिये जाते हैं। एक दो कालममें अंगरेजी लेख भी होते हैं, जो कभी कभी नकल और कभी कभी रियासतके किसी अंगरेजीदां सज्जनके लिखे होते हैं। ___“जयाजीप्रताप” इसी वर्षके जनवरी माससे महाराज जयाजीराव संधियाकी यादगारमें निकाला गया है। इसके सम्पादक बाबू श्रीलाल बी० ए० हैं। अंगरेजी आपकी अच्छी है। पर हिन्दी कैसी है यह खबर नहीं । अखबार में अधिक लेख नकल होते हैं, इससे सम्पादककी योग्यता जाननेका अवसर नहीं मिलता। आशा है कि आगेको सम्पादक महाशय कुछ अपनी लेखनीका बल दिखावंगे, जिसकी बड़ी जरूरत है। उक्त महोदयही गवालियार ष्टंट गजटके भी सम्पादक हैं। जयाजी- प्रतापका वार्षिक मूल्य २) है । गजटका दाम सरकारी तौर पर ८) और सर्वसाधारणसे १२) वार्पिक है। मुंशी लछमनदासके बाद रामचरणदास पांच साल तक गवालियर गजटके सम्पादक थे। पीछे सन् १८७३ ई० तक मुंशी ब्रजमोहनलाल गजटके सम्पादक और प्रेसके सुपरिण्टेण्डेण्ट रहे। कोई एक साल बाद [ ३८१ ]