पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४०६

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हिन्दी-अखबार तिवारीजी बहुतही धनहीन ब्राह्मण थे, इससे उनके पत्रने बड़ी कङ्गाल दशामें कई वर्ष बिताये। वह बेचारे अपना पत्र छपाकर स्वयं कन्धे पर लादे बेचते फिरा करते। लिखनेमें वह बड़े स्वतन्त्र थे। जीमें आता था सो लिखते थे। प्रयागकी खबर बहुत लिखते थे। लिखनेका ढङ्ग कोई पक्का न था। जब जैसा लिखा जाता वैसाही छप जाता। कोन- पुरनिवासी स्वर्गीय पण्डित प्रतापनारायण मिश्रको इस पत्रसे बड़ा प्रेम था। कालाकांकरमें हमने देखा था कि वह सबसे पहले उसे खोलकर पढ़ते थे और उसकी कोई न कोई खबर टीका टिप्पणी सहित “हिन्दोस्थान में नकल करते थे। “हिन्दीप्रदीप" और "प्रयागसमाचार"में एकबार चखचख भी चल चुकी है। हमने वह नम्बर उक्त दोनों पत्रोंके नहीं पढ़े, पण्डित प्रतापनारायणकी जुबानी उनकी बात सुनी थी। उससे मालूम होता है कि खूब फक्कड़बाजीकी नौबत आई थी। उर्दूके “तूतियेहिन्द” और “अवधपञ्च में जैसी नोकझांक हुई थी, उसीका नमूना इन दोनों पत्रोंकी छेड़छाड़ भी थी। वह समयही ऐसा था। अब वैसी बात अखबार नहीं लिख सकते। पण्डित प्रतापनारायणजी बड़े चावसे दोनों पत्रोंको बात सुनाते और छेड़छाड़का आनन्द लिया करते । ___ अब कई सालसे प्रयागसमाचार पण्डित जगन्नाथ शर्मा राजवैद्यके हाथमें है। तबसे इसकी दशा बहुत कुछ बदल गई है। आकार बड़ा हो गया है। लेखोंका ढङ्ग भी ठीक हो गया है। इस समय उसका आकार डबल रायल सीटके दो वरक है । तिस पर मूल्य वही है, जो बहुत छोटे आकारके समय था अर्थात् शहरवालोंसे केवल १) साल और बाहरवालोंसे १) साल। वैद्यजीके हाथमें आनेके बाद भी इस पत्रकी दशा जल्द-जल्द बदलती रही है। जब जैसा सम्पादक इसे मिला वैसाही रूप इस पत्रका होता गया। अब भी इसकी दशा स्थिर नहीं है । सम्पादक जल्द-जल्द बदलते रहते हैं। कोई सम्पादक साल दो साल [ ३८९ ]