पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४०७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास जमकर काम नहीं करता। जहां तक हम जानते हैं, वैद्यजीकी आर्थिक दशा अच्छी है । यदि वह चाहें तो पत्रको बहुत अच्छी दशामें निकाल सकते हैं । प्रयागमें हिन्दी अखबार निकालनेवालेको कई तरहके सुबीते हैं। “पायनियर" जैसा अंगरेजीका पहले नम्बरका दैनिकपत्र वहींसे निकलता है । इससे खबरों और पत्रकी इजतके लिये प्रयाग अच्छा स्थान है। फिर युक्तप्रदेश हिन्दीभाषाका प्रधान देश है और प्रयाग उसकी राजधानी । इस हिसाबसे प्रयाग हिन्दीका राजनिवास है । वैद्यजी महाराज कुछ रुपये पत्रको अच्छा करनेकी चेष्टामें खर्च करें और दो-चार सालके लिये चित्तको उदार कर ले तो उनका पत्र प्रयागका एक नामी पत्र हो सकता है। अच्छे सम्पादक रखकर काम चलाया जाय तो "प्रयागसमाचार”की खबर उसी चावसे हिन्दी जाननेवाले पढ़, जिस चावसे पायनियरकी अंगरेजीवाले पढ़ते हैं। भारतवर्षमें अखबार चलानेमें धन नहीं मिलता पर कीर्ति मिलती है। वैद्यजी भी चाहें तो थोड़ेसे रुपये खर्च करके बहुतसी कीर्ति पा सकते हैं। पिछले कई एक वर्षों में इस पत्रको जिन लोगोंने सम्पादन किया है, उनमेंसे कई एकके नाम हम जानते हैं। एक-दो सज्जन इसको बिना किसी प्रकारका वेतन लिये सम्पादन करते थे। वैद्यजीने स्वयं भी सम्पा- दकका काम किया है और अब भी जरूरत पड़ने पर करते हैं। पण्डित जगन्नाथप्रसाद शुक्ल कुछ दिन इसका सम्पादन कर गये । वह अब बम्बईके श्रीवेङ्कटेश्वर समाचारका सम्पादन करते हैं। कोई एक सालसे अधिक गहमर निवासी बाबू गोपालराम इसे लिखते रहे। आजकलके लेखोंसे विदित होता है कि वैद्यजी स्वयं लिखते हैं। हिन्दीके और चलते अखबारोंमेंसे एक काशीका भारतजीवन है। युक्तप्रदेशमें इसका प्रचार भी खासा है। ३ मार्च सन् १८८४ ई० को [ ३९० 1