पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४०८

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हिन्दी-अखबार इसने काशीमें जन्म लिया। इस पत्रके सम्पादक और मालिक बाबू रामकृष्ण वर्मा हैं। जबसे यह पत्र जारी है, बराबर निकलता चला आता है। उसका मूल्य डाकव्यय सहित १) वार्षिक है। आरम्भमें एक शीट रायलके ४ पन्नों पर छपता था। एक बार ८ पन्नों पर छपने लगा था, पर अब ६ पर छपता है। “भारतजीवन" अखबारी हैसियतसे चाहे किसी दशामें क्यों न रहा हो--हिन्दीकी सेवा उससे हुई है, इसमें सन्देह नहीं है । भारतजीवन प्रेसकी पोथियोंसे हिन्दोका बहुत कुछ प्रचार हुआ है । नाटक, उपन्यास, किस्से-कहानी, गजल, दाम्तान, कवित्त, कजली आदिकी कितनीही पोथियां उक्त प्रेसने छापी। कई एक बड़ी-बड़ी और कामको पोथियाँ भी उक्त प्रससे छपकर निकलीं पर अधिक ध्यान उन पोथियोंके छापने पर रहता है, जो जल्द विक जावे ।। "भारतजीवन" सदा एक दब्बू अखबार रहा है। स्वाधीनतासे लिखनेका उसे कभी हौसिला नहीं हुआ। विशेषकर स्थानीय मामलों में साफ-साफ लिखनेको उसको हिम्मत कभी नहीं हुई । काशीकी कितनीही बड़ी-बड़ी घटनाओंकी वह खबर तक भी नहीं छापता। बहुतसे मामले काशीमें ऐसे हुए हैं, जिनको खबर विदेशीय कागजोंमें बहुत जोर-शोरसे छपी हैं, पर “भारतजीवन" उनकी तरफसे एकदम चुप साध गया । "भारतजीवन" की उमरके इन बीस-बाइस सालमें कितनेही भारी- भारी मामले काशीमें होगये हैं, पर उसे उनके विषयमें मौनही धारण करना पड़ा है। काशी अखबार लिखनेवालोंके लिये कुछ कठिन स्थान है। पुलिसकी वहां बड़ी शक्ति है । कोतवालका वहां वैसाही अधिकार रहता चला आया है, जैसा जारका रूसमें । कारण यह कि अनपढ़ गुण्डे लोगोंका बहुत जोर रहता चला आया है और उधर काशीके रईसलोग निरे बोदे और कमहिम्मत होते चले आये हैं। इन दो बातोंने पुलिस और कोतवालके अधिकार वहां बेतरह बढ़ा दिये है। रईसोंको वहाँ [ ३९१ ।