पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४११

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास रायल आकारके दो बड़े-बड़े पन्नों पर निकला। दो रुपये साल उसकी कीमत हुई । प्रति सप्ताह कमसे कम एक चित्र उसमें प्रकाशित होने लगा। खबर ताजा ताजा निकलने लगी। लेख भी अच्छे होते थे ! एक-आध लेख हंसी-दिल्लगीका भी होता था । जिनके चित्र छपते थे, उनके चरित्र भी बहुधा निकला करते थे। बहुतसी ऐसी बात उसमें छपने लगी, जो किसी और हिन्दी अखबारमें न होती थीं । केवल एक ही दोष उसमें था कि उसकी भाषा बङ्गला ढङ्गकी होती थी। इसका कारण यहीं था कि उसका सम्पादक बङ्गाली था, उस समय वह बहुत साफ हिन्दी नहीं लिख सकता था और हिन्दीके अदब कायदे भी कम जानता था। इससे हिन्दीके दो चार सुलेखक उसकी किसी किसी बातसे नाराज हुए । पर इससे उसकी उन्नतिमें कुछ बाधा न पड़ी, वह खूब फैलने लगा। विश- षकर बिहार और युक्तप्रदेशमें उसका बड़ा आदर हुआ। थोड़ेही दिनोंमें उसकी ग्राहक संख्या दो हजार तक होगई । इतने ग्राहक कभी किसी पत्रके न हुए थे। “उचितवक्ता" के उससे पहले एक बार पन्द्रह सौ तक ग्राहक हुए थे। और भी शायद किसी एकाध अखबारके इतने या इससे अधिक प्राहक हुए थे। पर उनकी वह दशा बहुत दिनों तक स्थिर न रही । हिन्दी बङ्गवासीको जारी हुए एक वर्षसे अधिक हुआ था कि अचा- नक उसके प्रसिद्ध होनेका एक कारण निकल आया। वह कारण एक भारी विपदमें उत्पन्न हुआ था । “एज आफ कनसेण्ट बिल' सरकारने बड़ी जबरदस्तीसे पास किया था। “बंगवासी" उसका बड़ा विरोधी था। सरकारकी इस जबरदस्ती पर उसने कुछ कड़े लेख लिखे थे। सरकारने अप्रसन्न होकर "बंगवासी" पर राजविद्रोहका मुकदमा चला दिया । बंग- वासीके मालिक, मनेजर, सम्पादक और प्रिण्टरको २।३ दिन हवालातमें रहना पड़ा । अन्तमें वह कोई एक लाखकी जमानत पर छूटे। कलकत्ता