पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४२३

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास जरूरी बातोंपर उचित राय प्रगट करनेकी भारतमित्रकी पुरानी आदत है। नगरकी सफाई आदिके विषयमें जिस प्रकार आजकल भारत- मित्रको लिखना पड़ता है, बीस साल पहले भी उसे उसी प्रकार लिखना पड़ा है। २३ फरवरी सन् १८८२ के अंकमें दिखाया गया है कि कलकत्तेके दक्षिण विभाग अर्थात् अंगरेजी मुहल्लोंमें खूब सफाई रहती है, पर हिन्दुस्थानियोंके बसनेकी जगह उत्तर विभागमें खूब कूड़ा करकट फैला रहता है। २० साल पहले जिस बातका रोना था, वह अब भी है, आगे और कबतक रहे सो भगवान जाने । लेखप्रणालीकी उन्नति योंतो दो साल पहलेहीसे भारतमित्रकी लेख प्रणाली उन्नत होगई थी, पर सन् १८८३ ईस्वीसे उसकी और भी उन्नति हुई। कारण यह कि लार्ड रिपनने देशी पत्रोंको प्यारकी दृष्टिसे देखा था। उस समय इलबर्ट साहबके बिलको लेकर बड़ा आन्दोलन मचा था। गोरे साहब उससे बहुत घबरा गये थे। उनके जोश और ः गुस्सेका ठिकाना न था। इस विषयके लेख भारतमित्रमें खूब धूम धामसे निकलते थे। ८ मार्चके अङ्कमें 'टाउनहालकी राक्षसी सभा' और 'कुफर कचहरी' नामके दो लेख उसी विषयमें निकले हैं। पहला गम्भीर है, दूसरा दिल्लगीका। उस समय भारतमित्रकी भाषा ऐसी सुधरी हुई थी कि बहुत हिन्दी पत्रोंकी अब तक भी वैसी नहीं हुई है और उसमें वही सरल रीति मौजूद है, जिस पर आज कल भारतमित्र चल रहा है। इलबर्ट बिलके विषयमें भारतमित्रके लेख और भी कई हफ्ते तक जारी रहे। मईके अङ्कोंमें बाबू सुरेन्द्रनाथ बनीं-मुकदमेंके लेख भरे हुए हैं। उस मुकदमेंकी कलकत्तमें इलबर्ट बिलसे कम धूम नहीं पड़ी थी। एक मुकदमेमें जस्टिस नारिसने शालिग्रामजीकी मूर्ति अदालतमें [ ४०६ ]