पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४२७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास ___“बड़ेबाजारके हिन्दुस्तानी मारवाड़ी भाइयोंको चाहिये कि बड़े परिश्रमका उपार्जित धन नाच तमाशेमें खर्च न कर आपसमें चन्दा करके एक रिपन हिन्दी स्कूल स्थापन करें।" तब कुछ नहीं हुआ था, पर अब विशुद्धानन्द विद्यालय बना है और सारस्वत खत्रियोंने भी एक अलग हिन्दी अगरेजी स्कूल खोला है। मनुष्योंकी अच्छी आशाएं भी पूरी होती हैं, पर धीरे धीरे। ___ सन् १८८४ के भारतमित्रकी अन्तिम संख्यामें लार्ड रिपनकी विदाई- की बात है कि वह २० दिसम्बर सन् १८८४ को एस० एस० क्लाइव जहाज पर चढ़कर बम्बईसे विलायतको चले गये । किन्तु इससे पहले १३ दिसम्बर शुक्रवारको दिनके साढ़े तीन बजे भारतमित्र कमेटीके सम्पादक और बङ्ग देशके बङ्गला और उर्दू अखबारोंके सम्पादक भारत- मित्र कमेटीके हालमें एकत्र होकर गवर्नमेण्ट हौसमें गये और अङ्गरेजीमें एक एड्रेस श्रीमान् लार्ड रिपनको दिया, जो पंजाब, पश्चिमोत्तर प्रदेश, बङ्गाल, उड़ीसा,राजपूताना, मध्यप्रदेश आदिके देशी अखबारोंकी ओरसे भारतमित्रके उस समयके आनरेरी मनेजिङ्ग प्रोप्राइटर बाबू जगन्नाथ खन्नाने सुनाया था और एक चांदीके कासकेटमें रखकर श्रीमान्को अर्पण किया था। इस एड्रेस पर कोई अस्सी अखबारोंके सम्पा- दकोंके नाम थे। सन् १८८५ ईस्वी १ जनवरी सन् १८८५ ईखीके भारतमित्रमें कलकत्तेकी इण्डियन एसोसियेशनके उस एडूसके विषयमें एक लेख लिखा गया है जो उक्त सभाने २४ दिसम्बर १८८४ ईस्वीको नये लाट डफरिनको दिया था। उस एडू समें उक्त सभाने इस देशके बहुतसे अभावोंकी बातें कही थीं ; म्यूनिसिपलिटियोंकी उन्नति, व्यवस्थापक सभाओंका सुधार तथा और कितनीही बातें ऐसी लिखी थीं, जिनके लिये आजकल कांप्रस दावा किया [ ४१० ]