पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४३७

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गुप्त-निबन्धावली सेवाद-पत्रोंका इतिहास वह जून १८६३ ई० तक रहे, तब कुछ दिनके लिये पत्र डाक्टर वर्मनके प्रबन्धमें आया। तब पण्डित दुर्गाप्रसादजी मिश्र इसके सम्पादक थे, जो इसके जन्मदाताओं से भी हैं और जिन्होंने उचितवक्ताको भी जन्म दिया। इसके बाद यह पत्र भारतमित्र कम्पनीके हाथसे निकलकर बाबू जगन्नाथदासके हाथमें आया। यहां कई साल तक पण्डित रुद्रदत्त इसके सम्पादक रहे। सबसे अन्तमें पण्डित राधाकृष्ण चतुर्वेदी फिरसे तथा पंडित प्यारेलाल और बाबू ब्रह्मानन्द थे। सन् १८६६ ई. से वर्तमान सम्पादक द्वारा इसका सम्पादन होता है। “भारतमित्र" राजनीतिक पत्र है। आदिसे इसकी यही पालिसी है। हिन्दीका प्रचार और राजनीतिक चर्चा इसके प्रधान उद्देश्य हैं। धर्मका आन्दोलन करना इसकी पालिसी नहीं है। पर जरूरत पड़नेपर उसीमें शरीक होना वह अपना कर्त्तव्य समझता है। सदासे पुरानी चालके हिन्दू इसके परिचालक हैं, इससे उनके धर्मकी इसे काम पड़नेपर तरफदारी करना पड़ती है। यही चाल इसकी आरम्भसे अबतक है । केवल बीचमें एक दो आर्यसमाजके सम्पादकोंने इसको चाल बिगाड़ी थी। उनसे इसको बड़ी हानि भी पहुंची। जिसकी जो चाल है, उसीपर चलनेसे उसकी उन्नति होती है। उसके बिगड़नेसे बहुत भारी हानि होती है। यह एक अटल सिद्धान्त है । पर दुःख है कि हिन्दुओंमें कुछ लोग इस सिद्धान्तसे विचलित होकर अपनेको कमजोर बना रहे हैं। क्या मुसलमान, क्या कृस्तान, सब अपनी-अपनी चालपर चलते हैं, अपने-अपने धर्मका आदर करते हैं, अपनी-अपनी धर्म-संबंधी बातोंपर दृढ़ हैं। केवल हिन्दूही भटकते हैं, यह कैसे दुःखकी बात है ! २६ साल भारतमित्रको जारी हुए हो गये। तीन समय तबसे बदले। इसके मारी होनेके दिनसे पंडित हरमुकुन्दजीके सम्पादक रहने तक इसका पहला समय था, जब हिन्दी बहुत बालक थी। पंडित [ ४२० ]