पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४३९

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास अरबी भाषाकी कहावत है कि नई बात अच्छी लगती है, पर हम देखते हैं कि पुरानी बात और अच्छी लगती है। भारतमित्रकी पिछली बातोंको खोलनेमें स्वयं हमको भी बहुत कुछ आनन्द मिला और बहुत बातोंका ज्ञान हुआ। इससे कह सकते हैं कि खोजकर निकालनेसे पुरानी बात भी नई हो जाती हैं। असलमें नई बात वही है कि जिसे पहले मनुष्य जानता नहीं। हमारी तरह हमारे सहयोगी अमृतबाजारने अपनी कुछ पिछली वातं सुनाई, उनमेंसे हम भी कुछ बात सुनाते हैं। ___ लण्डनमें फौलर साहबने अपनी एक वक्तुनामें एक अङ्गरेजी अग्य- बारकी कहानी कही है। कहा कि "डेलीमेल' पत्र पर अब नित्य १५०० पोण्ड अर्थात् २२॥ हजार रुपये खर्च होते हैं। साल भरमें खालो छपाई- का विल २७ लाख रुपयेका होता है। इसपर अमृतबाजार कहता है कि हमारी कहानी "डेलीमेलसे" भी विचित्र है। ___ इस समय "अमृतबाजार प्रेम” का जैसा ठाटबाठ है, उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि वह केवल २४०) की पंजीसे जारी हुआ था। कलकत्तेके अहीरीटोलेमें एक उत्साही सज्जनने २४०) में एक प्रेसका सामान खरीदा था। पर वह उसे जारी करनेसे पहले मर गया। वही सामान कलकत्तसे खरीदा जाकर अमृतबाजार नामके एक छोटेसे गांवमें भेजा गया, जो बङ्गदेशके जेसोर जिले में है। इस दो सौ चालीस रुपयेके सामानमें सबसे कीमती एक बेलन प्रेस था, जिसका दाम ३२) था। गांवके बढ़ईकी सहायतासे वह खड़ा किया गया। इस प्रकार उस गांवमें एक छापाखाना खुला। कुछ योंहीसे सीखे-साखे आदमी टाईप कम्पोज करनेमें लगाये गये, मालिकको भो कम्पोज करना पड़ता था। सम्पादक और प्रेसमैन भी वहींसे तय्यार करने पड़े। वह वहींके निवासी थे और वहीं बहुत दिन तक रहे। इस प्रकार बङ्गाली भाषामें एक छोटी-सी साप्ताहिक [ ४२२ ।