पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४४७

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना 'सरस्वती' में छपकर सदाके लिये गुमनामीके गढ़ेमें चला जाय। वरच इसलिये छापा होगा कि उस पर लोग अपनी राय प्रकट कर और जो ठीक तत्त्व है वह निकल आवे । आत्मारामके लेखोंसे विदित होता है कि उसने द्विवेदीजीके उस लेखसे हिन्दी लेखकोंकी कुछ अप्रतिष्ठा समझी। हमारी समझमें भी उस लेखसे बहुत कुछ दम्भकी ध्वनि निकलती है, चाहे उसे द्विवेदीजीने मनकी कितनी ही सफाईसे लिखा हो। शायद इसी खयालसे आत्मारामने अपने लेखोंमें कटाक्षसे अधिक काम लिया है, पर उसके कटाक्ष हंसीसे भरे हुए हैं, विषैला कटाक्ष उसने एक भी नहीं किया। कटाक्ष भी द्विवेदीजो पर नहीं हैं। उनके किसी काम पर, या उनकी अगली पिछली दशा पर आत्मारामने कोई कटाक्ष नहीं किया है। उनकी पोथियोंको भी नहीं छुआ है ; केवल उसी लेखको लेकर उसने जो कुछ कहा है--कहा है। आत्मारामके कटाक्ष, उसकी चुलबुली दिल्लगियां, मीठी छेड़ जो कुछ है, द्विवेदीजीके लिखनेके ढंगपर, उनकी भाषाकी बनावट पर, उनके व्याकरण सम्बन्धी ज्ञान पर, उनके दखलदरमाकूलात पर, उनक गम्भीरताको सीमा-लंघन करने आदि पर हैं। हमारी समझमें बहसकी सीमासे बाहर आत्माराम बहुत कम गया है। किसी बातको उसने तूल भी नहीं दिया। वरञ्च जहाँ तक हो सका है, हरेक बातको बहुत थोड़में कहा है-यहाँ तक कि उसकी लिखी किसी पंक्तिसे यदि एक शब्द भी अलग कर दिया जाय तो सब मतलब गड़बड़ होजाय, फजूललिखनेका तो काम ही क्या है ? साथही आत्मा- रामने द्विवेदीजीकी बहुतसी भूलं दिखाई हैं, जिनमेंसे दो तीन मोटी मोटी भूलें यह हैं- “अनस्थिरता" ठीक नहीं, द्विवेदीजी "मुहाविरा" लिखते हैं, जिसका उच्चारण वह नहीं है जैसा वह लिखते हैं और बहुत बातें बताई हैं, जिनका अभी कुछ उत्तर नहीं मिला है। पर हम देखते हैं कि [ ४३० ]