पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४४८

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व्याकरण-विचार उनके कुछ तरफदार जामसे बाहर होगये हैं। वह भारतमित्र-सम्पादकको आत्माराम समझकर गालियोंसे प्रसन्न करने लगे हैं। यहाँ तक कि स्वयं द्विवेदीजी जैसे सभ्यता और शिष्टताके अभिमानीने भी कल्लू भाईका आल्हा पसन्द करके ऐसे लोगोंके रवैयेका समर्थन किया है। पण्डित गंगाप्रसाद अग्निहोत्री सभ्यताकी दुहाई देते हुए भी द्विवेदीजीकी बड़ाईका डका बजाते हैं। एक सज्जन देवीप्रसाद शुक्ल नामधारीने श्री वेंकटेश्वर- समाचारमें पदार्पण किया है। यह भी द्विवेदीजीकी अनानीयत हीका डका बजाते आये हैं। लेखक आरम्भमें ही गीदड़ों और शेरोंका एक श्लोक लिखकर उनक महत्त्व और अपने शिष्टाचारका परिचय देने आये हैं। द्विवेदीजोकी सब भूलोंको जेवर समझकर उनकी गठरी अपने साथ लिये फिरते हैं। कोई इनसे पूछे कि जब आपके शिष्टाचारका यह हाल है तो दूसरोंसे आप किस शिष्टाचारकी आशा रखते हैं ? हम भी कह सकते हैं कि यह शुक्लजी और कोई नहीं द्विवेदीजी हैं, पर ऐसा कहनेसे लाभ क्या ? द्विवेदोजो हों या और कोई, मतलब बातसे है न कि लेखकक कुल-शीलसे और उसके नाम-धामसे। बहस भाषा और व्याकरणकी है, चाहे उसे आत्माराम लिखे या भारतमित्र सम्पादक। चाहे लेखक वर्णमें ब्राह्मण हो या नाई, धार्मिक हो या अधार्मिक। भाषाकी बहसमें हम तो यहो समझते हैं कि धर्म या जाति, स्वर्ग या नरककी जरूरत नहीं है। बातका बातसे उत्तर दो, विचारसे उत्तर दो, बिगड़ने या नाराज होनेकी कोई जरूरत नहीं है। __ यदि द्विवेदीजी यह समझते हों कि जो कुछ वह लिखते हैं, वह ठीक है उसमें किसी हुजतकी जगह नहीं, तो समझल कि आत्मारामने जो कुछ कहा वह व्यर्थ है । उसको लेकर वह और उनके मित्र नाराज क्यों हों ? और यदि वह यह समझे कि दूसरे लोगोंको भी उनकी कही बात पर कुछ कहनेका अधिकार है तो आत्मारामकी बातोंमें उन्हें जो अच्छी [ ४३१ ]